3 Sept 2009

जब कोई चेतन स्तर पर जागरूक होता है, तब वह अपने अवचेतन में गहरे पैठे ईष्र्या, संघर्ष, इच्छाओं, लक्ष्यों, गुस्से की वजहों की खोज की शुरूआत भी कर देता है। जब मन अपने ही बारे में सम्पूर्ण प्रक्रिया की खोज का इरादा
रखता है, तब हर घटना, हर प्रतिक्रिया अपने ही बारे में जानने, अपनी ही खोज के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

इस सबके लिए धैर्यपूर्ण अवधान की आवश्यकता होती है। यह अवधान उस मन का पर्यवेक्षण नहीं होता जो निरंतर संघर्ष, द्वंद्व में, और यह सीखना चाहता है कि कैसे जागरूक रहा जाए।

तब आप जानेंगे कि जागरण के घंटों की तरह ही आपके सोने के घंटे भी महत्वपूर्ण हैं कि तब जीवन एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है।

जब तक आप अपने आपको नहीं जानते, भय निरंतर बना रहेगा और अन्य सारे संभ्रम भी जो आपका स्व या ‘मैं’ पैदा करता रहता है।

2 Sept 2009

जब मन निर्णयों-निष्कर्षों, सूत्रबद्धता के बोझ से दबा हुआ होता है, तब जिज्ञासा प्रतिबंधित होती है। यह बहुत जरूरी है कि खोज, जिज्ञासा हो। उस तरह नहीं जैसे एक क्षेत्र के विशेषज्ञ वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिकों द्वारा कोई खोज की जाती है। पर एक व्यक्ति द्वारा अपने ही बारे में जानने के लिए, अपने जीवन की पूर्णता को जानने के लिए, अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान अपने ही चेतन और अचेतन स्तर पर मन की शल्य क्रिया किया जाना नितांत आवश्यक है। कोई कैसे कार्यव्यवहार करता है, किसी की क्या प्रतिक्रिया होती है जब कोई आॅफिस जाता है, या बस पर सवार होता है, जब कोई अपने बच्चे, अपने पति या पत्नि से बातचीत करता है आदि आदि। जब तक मन अपनी संपूर्णता के प्रति जागरूक नहीं होता - वैसा नहीं जैसा कि ‘वो होना चाहता है’ बल्कि जैसा कि ‘वो है।’ जब तक कोई अपने फैसलों, धारणाओं, आदर्शों, अनुपालन की जाने वाली गतिविधियों के प्रति जागरूक नहीं होता यथार्थ की सृजनात्मक धारा के आने की कोई संभावना नहीं होती।

31 Aug 2009

आत्मज्ञान एक प्रक्रिया नहीं जिसके बारे में पढ़ा जाए या कल्पना की जाए। प्रत्येक व्यक्ति को अत्यधिक सजग होकर, खुद की ही क्षण-प्रति-क्षण की गतिविधियों में इसकी खोज करनी पड़ती है।
इस सजगता में एक ‘कुछ होने’ या ‘ना होने’ की इच्छारहित, एक विशेष विश्रांति, एक सकारात्मक जागरूकता होती है जिसमें मुक्ति की एक आश्चर्यजनक भावना चेतना में आती है।
यह अहसास केवल मिनिट भर के लिए, या केवल सेकंड भर के लिये ही हो सकता है पर काफी होता है। यह मुक्ति की भावना स्मृति से नहीं आती, यह एक जीवंत चीज है। लेकिन मन इसका स्वाद लेना चाहता है, इसका स्मृति में संचय करना, और बार-बार अधिक मात्रा में चाहता है।
इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जागरूकता केवल आत्मज्ञान द्वारा ही संभव है। आत्मज्ञान आता है हमारे जीवन के क्षण-प्रति-क्षण को गहराई से देखने से - कि कैसे हम बोलते हैं, हमारे हावभाव, जिस तरह हम वातार्लाप करते हैं। इन सब चीजों को देखने से, अचानक इनके पीछे छिपे आशयों का ज्ञान होता है।
इसके बाद ही भय से मुक्त हुआ जा सकता है। जब तक भय है तब तक प्रेम नहीं हो सकता। भय हमारे जीवन को कलुषता से भर देता है, यह कलुषता किसी भी प्रार्थना, किसी भी आदर्श या गतिविधि से नहीं मिटाई जा सकती। इस भय का कारण ‘मैं’ ‘अहं’ का होना है। यह ‘मैं’ अपनी इच्छाओं, माँगों, लक्ष्यों सहित बहुत ही जटिल है।
हमारे मन को इस सारी प्रक्रिया को समझना है और यह समझ चुनावरहित चौकन्‍नेपन(जागरूकता) से आती है।

29 Aug 2009

जब हम अपने बारे में जागरूक रहते हैं तो सारा जीवन मैं, अहं, स्व को उघाड़ने का जरिया बन जाता है। यह स्व एक जटिल प्रक्रिया है जो केवल सम्बन्धों में, हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों, जिस तरह हम बातचीत करते हैं, जिस तरह हम कोई फैसला लेते हैं, हिसाब-किताब करते हैं, जिस तरह हम अपनी और अन्य लोगों की आलोचना करते हैं - इन सब चीजों के बारे में जागरूकतापूर्वक देखने से मैं का सत्य उद्घाटित-अनावरित होता है।
इस सबसे हमारी अपनी विचारधारा की बंधी-बंधाई दशाएं अनावृत होती हैं, तो क्या यह बहुत जरूरी नहीं है कि हम इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जागरूक रहें।
पल-दर-पल सत्य क्या है इसकी जागरूकता से उस समयातीत, आत्म की खोज की जा सकती है। आत्मज्ञान के बिना आपका अंतःकरण, आत्म कुछ भी नहीं। जब हम अपने आपको नहीं जानते तब तक ‘आत्मा’, ‘अन्तःकरण’ शब्दमात्र होते हैं। ये एक इशारा, आश्चर्य, एक पाखण्ड, एक विश्वास और एक भ्रम होता है जिसमें मन पलायन कर सकता है। जब कोई ‘मैं’ को समझना शुरू करता है, जब कोई अपनी दिन-प्रति-दिन की सारी भिन्न-भिन्न गतिविधियों को देखता-समझता है, उनके प्रति जागरूक रहना आरंभ करता है तो इस समझ में अनायास ही उस नामातीत, समयातीत का अभ्युदय होता है, अस्तित्व में आता है। पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि वो नामातीत आत्मज्ञान की परिलब्धि होता है। नामातीत आत्मज्ञान की परिलब्धि नहीं है। उसके बाद अंतःकरण में ‘स्व’ नहीं दिखता, मन मस्तिष्क उसे नहीं पा सकते। वह तभी अस्तित्व में होता है जब मन शांत होता है। (कुछ लोग किसी की मृत्यु पर भी कहते हैं कि ‘‘वो शांत हो गया’’ ) मन के शांत, होने पर वह अस्तित्व में होता है। मन जब सहज रहता है, भंडारगृह की तरह अनुभवों, स्मृतियों के संचय, मूल्यांकन करने में नहीं लगा होता, तब वह सहज मन उस पूर्ण यथार्थ को समझ पाता है, वह मन नहीं जो मात्र शब्दों, ज्ञान, सूचनाओं से भरा हुआ हो।

24 Aug 2009

विचार के हर क्षण में एक निर्बाध जिज्ञासा


अपनेआप को जानने के लिए अमित अन्वेषण, अत्यंत श्रम की आवश्यकता है। उतनी मेहनत से भी ज्यादा जो आप जीवननिर्वाह के लिए करते हैं, जो दिनचर्या मात्र है। यहाँ विचार के प्रत्येक क्षण में अद्भुत जागरूकता और सतत प्रेक्षण की माँग होती है।

जिस क्षण से आप विचार प्रक्रिया में जिज्ञासा प्रारंभ करते हैं, जिसमें प्रत्येक विचार को अलग करना और उसके बारे में अंत तक सोचना है, तब आप जानते हैं कि यह कितना कठिन है। यह एक आलसी आदमी का आनन्द नहीं है। यह करना आवश्यक है क्योंकि यह केवल मन ही है जो स्वयं को पुरानी स्मृतियों, पुरानी विचलितताओं, उलझनों, परस्पर-आत्म-विरोध से खुद को रिक्त कर सकता है। और यह मन ही है जो यथार्थ के सृजनात्मक संवेग के साथ नयापन लिये रहता है, तब मन खुद ही कर्मों का सृजन करता है जो उसके अस्तित्व को अनूठे आयाम के साथ समग्रता से संबंधित करता है। इसके बिना किसी भी तरह के सामाजिक सुधार या पुर्ननिर्माण, जो कितने ही जरूरी हों, कितने ही लाभदायक हों किसी भी तरह शांत और खुशहाल विश्व नहीं दे सकते।

22 Aug 2009

कोई बाहरी अस्तित्व नहीं जो इसको गायब कर दे।

बहुत ही सीधे ढंग से कहें तो क्या यह मेरे लिए संभव है कि मैं खुद को विस्मृत कर सकूं? तुरंत ‘हाँ’ या ‘नहीं’ मत कहिये। विचारिये। हम नहीं जानते कि इसका अर्थ क्या है। धार्मिक किताबों में यह और वह कहा गया है, लेकिन वह निरे शब्द हैं और शब्द यथार्थ नहीं होतें। मन के लिए महत्वपूर्ण यह है कि वो इकट्ठा देखे, अनुभवकर्ता, विचारक और देखनेवाला या ‘मैं’ क्या इसका विलोप हो सकता है? क्या यह स्वयं खो सकता है? यह तो पक्का हे कि कोई बाहरी अस्तित्व नहीं जो इसको गायब कर दे। यदि ‘मन’ यह कहता है कि ‘इस मैं’ को खत्म होना ही चाहिए क्योंकि इसके मिटने के बाद ही मुझे वह आनन्दमयी दशा प्राप्त होगी जिसका उल्लेख पवित्र किताबों में किया गया है, तो यह मात्र एक ऐसी क्रिया है जो इच्छा से प्रेरित है, और एक रूप है जो अस्तित्व में आना चाहता है, इस लिए ‘मैं’ अभी भी पूरी तरह बचा रहता है।