24 Apr 2014

कोई कैसे किसी चीज को कैसे पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे?

कोई कैसे किसी चीज को कैसे पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे? कोई कैसे भय को पूरा का पूरा देखे, ना कि भय को विभिन्न रूप और आकारों में बंटा हुआ.. आधा-अधूरा। ना कि चेतन और अचेतन मन के भय, चेतन रहते हुए भय और अचेतन रहते हुए भय.. अपितु सम्पूर्ण भय को। आप समझे? कोई कैसे भय को.. पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे? 

कोई कैसे ‘मैं’, ‘अहं’ या ‘स्व’ को पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे? अहं जो विचार से बना है, जो विचार से अलग कर दिया गया है, विचार जो कि खुद टुकड़े-टुकड़े में बँटा हुआ है.. इसलिए विचार ‘मैं’ को गढ़ता है और सोचता है कि ‘मैं’ विचार से कुछ अलग है, स्वतंत्र है। ‘मैं’ सोचता है कि वह ‘विचार’ से अलग है, लेकिन विचार ने ही ‘मैं’ को बनाया होता है.. उसकी सारी चिंताओं, डरों, घमंड, आत्मप्रदर्शन, सन्ताप, सुख, पीड़ा, आशाओं सहित। इस ‘मैं’ ‘अहं’, ‘स्व’ को विचार ही बनाता है। और फिर ‘मैं’, ‘विचार’ से मुक्ति की बात करता है, वह सोचता है.. उसकी अपनी जिन्दगी है। जैसे कि कोई माईक जिसे विचार ने ही बनाया है, पर वो विचार से अलग भी है। कोई पर्वत, विचार ने नहीं बनाया है लेकिन वो विचार से अलग है। ‘मैं’ को ‘विचार’ ही बनाता है और फिर ‘मैं’ कहता है कि ‘मैं विचार से पृथक, मुक्त हूं’। अब आपको यदि पूर्णता में देखना है... आप समझे.. क्या आपको अब यह सब साफ-साफ स्पष्ट दिखा? 

तो अब बतायें कि भय पूर्णता में क्या है? ना कि भय के भिन्न रूप, ना कि डर की विभिन्न पत्तियाँ बल्कि भय का सारा का सारा वृक्ष, सम्पूर्ण वृक्ष? ठीक? तो अब बतायें कि किसी को भय को पूरा का पूरा कैसे देखना चाहिए? 

किसी चीज को उसकी पूर्णता में देखने या सुनने के लिए मुक्त होना जरूरी है, क्या नहीं? पूर्वाग्रहों से मुक्त होना, अपने निष्कर्षों से मुक्त होना, इस बात से मुक्त होना कि आप भय से मुक्त होना चाहते हैं, भय की तर्कसंगत व्याख्या की इच्छा से मुक्त होना। कृपया इस सब को देखें। किसी इच्छा को नियंत्रित करने की इच्छा से मुक्त होना... क्या मन इन सब चीजों से मुक्त हो सकता है? अन्यथा वह कभी भी सम्पूर्णता को, किसी चीज को पूरा का पूरा नहीं देख सकता। मैं डरा हुआ हूं। मैं डरा हुआ हूं ‘कल’ के डर से, नौकरी छूट जाने, खो जाने के डर से, असफल होने के डर से, अपना पद-प्रतिष्ठा खो जाने के डर से, या इस डर से कि मेरे सामने चुनौतियाँ आयेंगी और मैं उनका सामना नहीं कर पाऊंगा, चुनौतियों से संघर्ष की क्षमता खो दूंगा... उन सारे भयों डरों को देखना जो कि किसी को हो सकते हैं। 

क्या आप इन/इस सबको... बिना ‘किसी विचार’ को बीच में लाए, विचार की किसी गतिविधि के बिना देख सकते हैं? विचार... जो कि समय है... विचार की सक्रियता या कोई गतिविधि जो कि भय का कारण है। क्या आप कुछ समझे?


How does one perceive the whole of anything?

How does one perceive the whole of anything? The whole of fear, not the broken up of fear in different forms or the fear of the unconscious and the conscious - in the conscious and in the unconsciousness - but the whole of fear. You understand? How does one perceive the whole of fear? How do I perceive the whole of me - the 'me' constructed by thought, isolated by thought, fragmented by thought which in itself is fragmented? So it creates the 'me' and thinks that 'me' is independent of thought. The 'me' thinks it is independent of thought but it has created the 'me' - the 'me' with all its anxieties, fears, vanities, agonies, pleasures, pain, hopes - all that. That 'me' has been created by thought. And that 'me' becomes independent of thought, it thinks it has its own life - like a microphone which is created by thought, and yet it is independent of thought. The mountain is not created by thought but yet it is independent. The 'me' is created by thought and the 'me' says: "I am independent of thought". Now to see the totality - you understand - is this clear now? So what is fear totally - not the various forms of fear, not the various leaves of this tree of fear but the total tree of fear? Right? How does one see the totality of fear? To see something totally or to listen to something completely there must be freedom, mustn't there? Freedom from prejudice, freedom from your conclusion, freedom from your wanting to be free of fear, freedom from the rationalization of fear. Please follow all this. Freedom from the desire to control it - can the mind be free of all that? Otherwise it can't see the whole. I am afraid. I am afraid because of tomorrow, losing a job, afraid I may not succeed, afraid I might lose my position, afraid that there I will be challenged and I'll not be able to reply, afraid of losing my capacity - all the fears that one has. Can you look at it without - please listen - any movement of thought which is time, which causes fear? Have you understood something?

Saanen 4th Public Talk 20th July 1975


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