22 Jun 2014

धारणा या विश्वास, आत्म ज्ञान में बाधक हैं

अगर हमारी कोई धारणा या विश्वास ना हो, तो हमारे साथ क्या होगा? क्या हम इस बात से भयभीत नहीं हो जाएंगे कि ‘‘अब क्या होगा?’’
यदि हमारे पास ईश्वर या साम्यवाद, या समाजवाद, या सामाज्यवाद या किसी तरह के धार्मिक सूत्र या ऐसे ही किसी धर्मसिद्धांत पर आधारित कर्मों का एक पका-पकाया, नियत ढर्रा ना हो, जिसकी हमें आदत ना पड़ी हो, तो हम खुद को निपट खाली, हैरान परेशान पाते हैं? क्या हमारे साथ ऐसा ही नहीं होता?
विश्वास या धारणा को इस तरह स्वीकारना, क्या इस बात की स्वीकृति नहीं है कि उस हम भय को ढंकते हैं, जो भय ‘हमारे कुछ ना होने’, या ‘निपट खाली’ पाए जाने के ख्याल मात्र से पैदा होता है।
आखिरकार, एक कप तभी उपयोगी होता है जब वह खाली हो; और एक ऐसा मन जो विश्वासों-धारणाओं, मत-सिद्धांतों से भरा पड़ा हो, दृ़ढ़प्रतिज्ञ या दावेदार हो, या उद्धरणों से भरा हो, वह हकीकतन एक असृजनात्मक मन होता है....वो हकीकत में मात्र एक दोहराने वाला, तोते या रोबोट जैसा मन ही होता है।
खालीपन के भय से, अकेलेपन के भय से, ठहरे या निष्क्रिय होने के भय से, कहीं ना पहुंच पाने की भय से, सफल ना होने के भय से, कोई उपलब्धि ना पा पाने के भय से या अभी ‘ना कुछ ’ होने के भय से, और भविष्य में भी ‘कुछ ना’ होन के भय से.... यही कारण होतें है, या पक्के तौर पर इन्हीं में से किसी कारण से ... इन डरों से पलायन करते हुए, हम बड़े आतुर रहते हैं... लालच रहता है कोई विश्वास या धारणा या ‘मत‘ मान लें, स्वीकार कर लें...

परन्तु, किसी विश्वास या धारणा को स्वीकार करने से, क्या हम स्वयं को समझ सकते हैं? जबकि इसके विपरीत.. एक विश्वास या धारणा, चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक, यह बिल्कुल साफ है कि धारणा या विश्वास हमें स्वयं को समझने में बाधक रूकावट बनते हैं। यह एक ऐसी धंुधली परत की तरह हैं जिसके पार से, हम अपने आपको देखते हैं ।
क्या हम अपने ‘स्व’ को बिना विश्वास या धारणा के देख सकते हैं? अगर हम इन धारणाओं को हटा दें, इन सभी विश्वासों-धारणाओं को हटा दें... जो कि कोई भी आदमी मान या ओढ़ सकता है... तो क्या देखने को कुछ बाकी रह जाता है?
यदि हम कोई भी विश्वास या धारणा नहीं रखें, जिन्हें कि हमारा मन मानता है, जिनके रूप में अपने को पहचानता है तो बिना किसी पहचान के वह मन अपने आप को वैसा ही देखने में समर्थ/ सक्षम हो जाता है... जैसा कि वह वास्तविकता में, यथारूप है, और तब निश्चित ही तब ही हम खुद को समझने की शुरूआत करते हैं।
Belief hinders true understanding
If we had no belief, what would happen to us? Shouldn't we be very frightened of what might happen? If we had no pattern of action based on a belief either in God, or in communism, or in socialism, or in imperialism, or in some kind of religious formula, some dogma in which we are conditioned, we should feel utterly lost, shouldn't we? And is not this acceptance of a belief the covering up of that fear - the fear of being really nothing, of being empty? After all, a cup is useful only when it is empty; and a mind that is filled with beliefs, with dogmas, with assertions, with quotations, is really an uncreative mind; it is merely a repetitive mind. To escape from that fear - that fear of emptiness, that fear of loneliness, that fear of stagnation, of not arriving, not succeeding, not achieving, not being something, not becoming something, is surely one of the reasons, is it not, why we accept beliefs so eagerly and greedily? And, through acceptance of belief, do we understand ourselves? On the contrary. A belief, religious or political, obviously hinders the understanding of ourselves. It acts as a screen through which we look at ourselves. And can we look at ourselves without beliefs? If we remove these beliefs, the many beliefs that one has, is there anything left to look at? If we have no beliefs with which the mind has identified itself, then the mind, without identification, is capable of looking at itself as it is, and then surely there is the beginning of the understand of oneself.
J. Krishnamurti, The Book of Life

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5 Jun 2014

हम अकेलेपन का सामना क्यों नहीं करते?


हम सभी को जर्बदस्त अकेलेपन का अनुभव होता है, जब किताबें, धर्म आदि, सब कुछ चला जाता है, हम अन्दर ही अन्दर भयंकर अकेलापन और खालीपन महसूस करते हैं।
हममें में से अधिकतर लोग इस खालीपन, इस अकेलेपन का सामना नहीं करते और हम इससे भागते हैं, पलायन करते हैं। निभर्रता एक ऐसी ही चीज है...जिस ओर हम भागते हैं, हम किसी पर निर्भर हो जाते हैं... क्योंकि हम अपने अकेलेपन के साथ ही खड़े नहीं रह पाते।
रेडियो या किताबें या लोगों से बातें और लगातार यहां-वहां की बातें, कला और संस्कृति जैसी चीजें... हमें चाहिए ही होती हैं। आधुनिक युग में इंटरनेट पर सोशल वेबसाईट की गतिविधियां और चेटिंग कर्म भी इसी श्रंखला की चीजें हैं।
तो हम इस बिन्दु पर पहुंचते हैं कि हम जानते हैं कि यहां स्वयं के अलगाव, अकेलेपन का यह एक असाधारण अहसास होता है।
भले ही हमारे पास एक अच्छी नौक्री हो, हम जोरधार काम-काज में लगे हों, किताबें लिख रहे हों, पर अन्दर ही अन्दर एक भयंकर निर्वात सा होता है। हम इस खालीपन को भरना चाहते हैं और किसी चीज पर निर्भर होना, इस खालीपन को भरने का एक तरीका होता है।
हम इस निर्भरता का इस्तेमाल करते हैं, मनोरंजन, मंदिर या चर्च जाना, सामाजिक कार्य, धर्म, शराब, शबाब, ऐसी ही दर्जनों चीजें इस अकेलेपन को भरने के लिए इस्तेमाल होती हैं।
अगर हम देखें कि इसे ढंकने की कोशिश बहुत ही बेकार होती है, पूरी तरह व्यर्थ। मौखिक रूप से ही नहीं, आपके मानने की ही बात नहीं, ना ही आपकी सहमति या किसी फैसले की तरह... बल्कि यदि हम इस बात की कुल निरर्थकता, अनुपयुक्तता को देखें तब शायद हम इसमें जो तथ्य है उसका सामना कर पायें।
यहां यह प्रश्न नहीं है कि इस निर्भरता से मुक्त कैसे हों? यह प्रश्न तथ्य नहीं है, यह तो तथ्य को दी गई प्रतिक्रया मात्र है। क्यों हम, तथ्य का सामना नहीं करते, और यह नहीं देखते कि ‘अब क्या होता है?’

अब जो समस्या पैदा होती है वह है अवलोकनकर्ता और अवलोक्य या अवलोकन की। जो ‘देख रहा है’ और ‘जो दिख रहा है’ उसकी। अवलोकनकर्ता कहता है, मैं खाली हूं; मैं यह पसंद नहीं करता और उससे दूर भागता है। अवलोकनकर्ता कहता है कि ”मैं खालीपन या रिक्तता से परे हूं, अलग हूं।“ लेकिन अवलोकनकर्ता ही खालीपन या रिक्तता है; यह कुछ ऐसा नहीं कि खालीपन या रिक्तता किसी अवलोकनकर्ता द्वारा देखी जा रही होती है। अवलोकनकर्ता ही अवलोक्य है। जो ‘‘देख रहा है’’, वह ही ‘‘देखा जा रहा’’ भी है। यही वह जगह है जहां अगर तथ्य का अहसास हो जाये, विचारणा में अनुभव-अहसास में जर्बरर्दस्त क्रांति होती है,

Most of us can't face that emptiness

We have all had the experience of tremendous loneliness, where books, religion, everything is gone and we are tremendously, inwardly, lonely, empty. Most of us can't face that emptiness, that loneliness, and we run away from it. Dependence is one of the things we run to, depend on, because we can't stand being alone with ourselves. We must have the radio or books or talking, incessant chatter about this and that, about art and culture. So we come to that point when we know there is this extraordinary sense of self-isolation. We may have a very good job, work furiously, write books, but inwardly there is this tremendous vacuum. We want to fill that and dependence is one of the ways. We use dependence, amusement, church work, religions, drink, women, a dozen things to fill it up, cover it up. If we see that it is absolutely futile to try to cover it up, completely futile, not verbally, not with conviction and therefore agreement and determination, but if we see the total absurdity of it , then we are faced with a fact. It is not a question of how to be free from dependence; that's not a fact; that's only a reaction to a fact. Why don't I face the fact and see what happens?
The problem now arises of the observer and the observed. The observer says, "I am empty; I don't like it" and runs away from it. The observer says, "I am different from the emptiness." But the observer is the emptiness; it is not emptiness seen by an observer. The observer is the observed. There is a tremendous revolution in thinking, in feeling, when that takes place.

J. Krishnamurti, The Book of Life

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25 Apr 2014

प्रतिबद्ध या बंधा हुआ मन ...स्वस्थ नहीं होता


संगठित धर्मों के मध्य जो सामाजिक अन्याय, सामाजिक दुर्दशा, सामाजिक नैतिकता और संस्कृति के हालात हैं, इन्हें देखें और यदि इनकी वैधता को मनोवैज्ञानिक रूप से नकारें, तो शायद हम असाधारण रूप से नैतिक हो सकें। क्योंकि आखिरकार नैतिकता ही सुव्यवस्था या अनुशासन है; नैतिक उत्कृष्टता (सद्गुण, अच्छाई, भलाई) सम्पूर्ण अनुशासन या सुव्यवस्था है। और यह तभी अस्तित्व में आती है जब आप अव्यवस्था को नकारें, वह दुव्र्यवस्था जिसमें हम जी रहे रहे हैं, द्वंद्व की अव्यवस्था, भय की अव्यवस्था जिस में हर आदमी व्यक्तिगत सुरक्षा ढूंढ रहा है। 

मुझे नहीं पता कि आपने कभी सुरक्षा के प्रश्न पर विचार किया हो। आपको पता है हम, लोगों से वादों में, प्रतिबद्धता में सुरक्षा ढूंढते हैं; यदि हमसे (या हम किसी से) कोई वचन दे, कोई प्रतिबद्धता दिखायें तो हम बहुत ही सुरक्षित महसूस करते हैं, चाहे वो हिन्दू होने, मुसलमान होने या ईसाई होने या इसी तरह का कुछ होने में वह सुरक्षितता मिले। यह प्रतिबद्धता या कुछ होना हमें सुरक्षितता देता है। यदि हम स्वयं से ही किसी काम के लिए प्रतिबद्ध हैं... तो यह प्रतिबद्धता हमें बड़ी ही निश्चितता, भरोसा, आश्वस्तता दिलाती है। 

लेकिन यह प्रतिबद्धता हमेशा ही अव्यवस्था पैदा करती है, और यही चीज है जो वाकई यथार्थतः हमेशा घटित होती है। 

मैं हिन्दू हूं.. आप हिन्दू नहीं है या जो भी हैं। मैं अपनी निश्चित धारणाओं, संकल्पनाओं-सिद्धांतों, श्लोकों-नारों के प्रति प्रतिबद्ध हूं और इएलिए हम बंट जाते हैं आप ‘वो हैं‘ और ‘मैं ये हूं’। जबकि यदि हम किसी विषय में सम्बद्ध या शामिल तो हों.. पर प्रतिबद्ध नहीं, बल्कि जीवन की समग्र गति में शामिल हों तो यह भेद या बंटवारा नहीं होगा; तब हम मनुष्य होंगे.. दुख में.. ना कि एक दुःखी हिन्दू, दुःखी मुसलमान या दुःखी ईसाई.. तब हम केवल मात्र मनुष्य होंगे जो दोषी हैं, पश्चाताप में हैं, बेचैन हैं, यातनाएं झेल रहे हैं, अकेले हैं और रोजाना की जिंदगी से बोर हो रहे हैं। अगर हम एक साथ इकट्ठें हों... तो हम इन सब चीजों से बाहर आने का रास्ता मिलकर ढूंढ लेंगे। लेकिन हम प्रतिबद्ध होना पसंद करते हैं, हम चाहते हैं कि हम अलग-थलग.. अकेले सुरक्षित रहें, राष्ट्र या सम्प्रदाय के रूप में ही नहीं... बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी। इस प्रतिबद्धता में ही अलगाव है। और जब मन किन्हीं चीजों से प्रतिबद्ध या बंधा हुआ होता है, वह अलग थलग अकेला होता है और स्वस्थ भी नहीं होता।

When the mind is isolated it is not sane

To look at social injustice, social misery, social morality and culture in the midst of which organized religions exist, and to deny their validity psychologically, is to become extraordinarily moral. Because after all morality is order; virtue is complete order. And that can only come into being when you deny disorder, the disorder in which we live, the disorder of conflict, of fear in which each individual is seeking personal security. I do not know if you have ever considered the question of security. You know we find security in commitment; in being committed to something there is a great feeling of security, in being a Communist, in being a Frenchman, or an Englishman, or anything else. That commitment gives us security. If you have committed yourself to a course of action, that commitment gives a great deal of surety, assurance, certainty. But that commitment always breeds disorder, and this is what is actually taking place. I am a Communist and you are not -whatever you are. We are committed to ideas, to theories, to slogans and so we divide, as you are this and I am that. Whereas if we are involved, not committed, involved in the whole movement of life then there is no division; then we are human beings in sorrow, not a Frenchman in sorrow, not a Catholic in sorrow, but human beings who are guilty, anxious, in agony, lonely, bored with the routine of life. If you are involved in it, then we'll find a way out of it together. But we like to be committed, we like to be separately secure, not only nationalistically, communally, but also individually. And in this commitment there is isolation. When the mind is isolated it is not sane.
Talks in Europe 1968, Social Responsibility

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