2 Feb 2015

कोई भी समस्या, हमेशा नई होती है... पर क्या हमारे पास हमेशा नया जवाब होता है?


प्रत्येक चुनौती को स्वाभाविक ही अपरिहार्यत: नया प्रत्युत्तर चाहिए होता है क्योंकि आज समस्या उससे बिल्कुल ही भिन्न होती है जो कि वो कल थी। हर समस्या हमेशा नई होती है; और समस्या हर समय हर पल रूपान्तरण से गुजरती होती है. हर चुनौती नये प्रतिसाद की मांग करती है, उसे नया जवाब चाहिए होता है, और हमारे पास तब कोई जवाब नहीं हो सकता, यदि मन मुक्त ना हो। तो मुक्ति चाहिए..स्वतंत्रता चाहिए बस आखिर में नहीं...बल्कि शुरूआत में ही।
अवश्य ही क्रांति की शुरूआत होनी चाहिए, निश्चित ही, लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक स्तर पर नहीं बल्कि उच्चतम स्तर पर; और 'उच्चतम स्तर पर खोज' ही समस्या है' उसकी खोज जिसे 'उच्चतम स्तर' कहा जा रहा है ना कि महज उसे स्वीकार लेना जो कि कहा जा रहा है कि 'उच्चतम स्तर' है। मुझे नहीं पता कि मैं अपने आपको, आपसे इस बिन्दु पर साफ साफ अभिव्यक्त कर पा रहा हूं।

कोई कह सकता है कि उच्चतम स्तर क्या है...किसी गुरू के हवाले से, किसी बुद्धिमान के अनुसार, और कोई उसे बार बार दुहरा भी सकता है जो कि उसने कहीं से सुना, लेकिन यह प्रक्रिया खोज नहीं है। यह महज सहमत होना या स्वीकारना है किसी की प्रभुता को... और हममें से ज्यादातर लोग किसी ना किसी की प्रभुता स्वीकार लेते हैं क्योंकि हम आलसी हैं। वह सब जो कभी सोचा गया है, हम स्वीकार लेते हैं..और हम उसे दोहराते हैं एक ग्रामोफोन रिकार्ड की तरह...

तो अब, मैं देखता हूं कि खोज, जांच पड़ताल की आवश्यकता है क्योंकि यह जाहिर ही है कि हमें एक पूरी तरह नयी तरह की संस्कृति गढ़नी ही होगी — वो संस्कृति जो किसी अथॉरिटी पर आधारित ना हो बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की खोज, जांच और उसकी उस समझ पर आधारित ​हो कि 'सत्य क्या है? और यह खोज मांगती है.. पूर्ण स्वतंत्रता संम्पूर्ण मुक्ति।

यदि मन बंधा हो, फिर चाहे जंजीर कितनी ही लम्बी हो, वह एक नियत परिधि में ही कार्य करता है, और इसलिए वह मुक्त नहीं। तो जो जरूरी है वह यह कि उस उच्चतम स्तर की खोज की जाए जहां क्रांति घटित हो सके, और इसके लिए विचारों में अति सपष्टता की आवश्यकता है... जिसके लिए एक भले और जांच को उत्सुक, तत्पर मन की आवश्यकता है ना कि ऐसे मन कि जो कि ग्रामोफोन की तरह रिकार्ड किये गये को दोहराता रहता हो, बल्कि ऐसे मन की जरूरत होती है जो कड़ी विचारशीलता में सक्षम हो, तर्क के अंत तक जाने में सक्षम में, स्पष्ट तीक्ष्ण रूप से, तार्किक रूप से, और निर्दोष रूप से। किसी के भी पास ऐसा मन होना चाहिए, और केवल तब ही इससे आगे जाया जा सकता है।


Any problem is always new
To every challenge there must obviously be a new response because today the problem is entirely different from what it was yesterday. Any problem is always new; it is undergoing transformation all the time. Each challenge demands a new response, and there can be no new response if the mind is not free. So freedom is at the beginning, not just at the end.

Revolution must begin, surely, not at the social, cultural, or economic level, but at the highest level; and the discovery of the highest level is the problem -the discovery of it, not the acceptance of what is said to be the highest level. I don't know if I am explaining myself clearly on this point. One can be told what is the highest level by some guru, some clever individual, and one can repeat what one has heard, but that process is not discovery; it is merely the acceptance of authority, and most of us accept authority because we are lazy. It has all been thought out, and we merely repeat it like a gramophone record.

Now, I see the necessity of discovery because it is obvious that we have to create a totally different kind of culture -a culture not based on authority but on the discovery by each individual of what is true, and that discovery demands complete freedom. If a mind is held, however long its tether, it can only function within a fixed radius, and therefore it is not free. So what is important is to discover the highest level at which revolution can take place, and that demands great clarity of thought; it demands a good mind -not a phony mind which is repetitive, but a mind that is capable of hard thinking, of reasoning to the end, clearly, logically, sanely. One must have such a mind, and only then is it possible to go beyond.
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4 Aug 2014

प्याला तभी काम में लिया जा सकता है जब वह खाली हो।

हम में से अधिकांश लोगों के मन... बहुत सारी बातों से, बहुतेरी बातोंसे भरे पड़े हैं- सुखद और दुखद अनुभवों से, ज्ञान से, व्यवहार के नियमों और रीति-रिवाजों सेऔर इसी प्रकार की अन्य चीजों से। हमारा मन कभी खाली नहीं रहता। जबकि सृजन उसी मन में हो सकता है जो पूरी तरह से खाली हो।

शायद आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया हो कि जब आप कोई चीज कहीं रखकर भूल जाएं या किसी बात को याद करने की कोशिश करें तो वह लाख कोशिश करने पर भी याद नहीं आती, जुबान पर नहीं आती। लेकिन जब आप कभी किसी और काम में मग्न हों या फुर्सत से बैठे हों तो वह चीज अनायास ही याद आ जाती है।
जब आप किसी समस्या का सामना कर रहे हों चाहे वह गणितीय समस्या हो या मनोवैज्ञानिक... तब कभी कभी ऐसा होता है कि आप उस समस्या के बारे में खूब सोचते हैं, उस विषय पर जुगाली किये चले जाते हैं, परन्तु आपको उस समस्या का निदान नहीं मिल पाता। थक-हार का आप उसे छोड़ देते हैं, उससे हट जाते हैं, टहलने निकल जाते हैं और तब उस खालीपन में, फुर्सत में...उस समस्या का हल निकल आता है।

तो यह कैसे होता है? आपका मन उस समस्या को लेकर अपनी सीमा में बहुत अधिक क्रियारत या सक्रिय या गतिशील हो जाता है लेकिन उसे समस्या का समाधान नहीं मिलता तो आप उस समस्या को उठाकर एक ओर रख देते हैं। इससे आपका मन काफी हद तक शांत हो गया, काफी हद तक खाली हो गया। और तब, उस मौन में, उस खालीपन में समस्या का समाधान संभव हो पाया।
इसी प्रकार जब कोई पल पल अपने भीतरी परिवेश के प्रति, भीतरी क्रियाओं प्रतिक्रियाओं के प्रति, भीतरी स्मृतियों के प्रति, गहन मानसिक गतिविधियों के प्रति और व्यग्रताओं के प्रति जब मृतप्राय हो पाता है, उन्हें उठाकर एक ओर रख देता है... तब उसमें एक रिक्तता या खालीपन आ जाता है, इस खालीपन में ही कुछ नवीन सहज घटित हो सकता है।



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22 Jun 2014

धारणा या विश्वास, आत्म ज्ञान में बाधक हैं

अगर हमारी कोई धारणा या विश्वास ना हो, तो हमारे साथ क्या होगा? क्या हम इस बात से भयभीत नहीं हो जाएंगे कि ‘‘अब क्या होगा?’’
यदि हमारे पास ईश्वर या साम्यवाद, या समाजवाद, या सामाज्यवाद या किसी तरह के धार्मिक सूत्र या ऐसे ही किसी धर्मसिद्धांत पर आधारित कर्मों का एक पका-पकाया, नियत ढर्रा ना हो, जिसकी हमें आदत ना पड़ी हो, तो हम खुद को निपट खाली, हैरान परेशान पाते हैं? क्या हमारे साथ ऐसा ही नहीं होता?
विश्वास या धारणा को इस तरह स्वीकारना, क्या इस बात की स्वीकृति नहीं है कि उस हम भय को ढंकते हैं, जो भय ‘हमारे कुछ ना होने’, या ‘निपट खाली’ पाए जाने के ख्याल मात्र से पैदा होता है।
आखिरकार, एक कप तभी उपयोगी होता है जब वह खाली हो; और एक ऐसा मन जो विश्वासों-धारणाओं, मत-सिद्धांतों से भरा पड़ा हो, दृ़ढ़प्रतिज्ञ या दावेदार हो, या उद्धरणों से भरा हो, वह हकीकतन एक असृजनात्मक मन होता है....वो हकीकत में मात्र एक दोहराने वाला, तोते या रोबोट जैसा मन ही होता है।
खालीपन के भय से, अकेलेपन के भय से, ठहरे या निष्क्रिय होने के भय से, कहीं ना पहुंच पाने की भय से, सफल ना होने के भय से, कोई उपलब्धि ना पा पाने के भय से या अभी ‘ना कुछ ’ होने के भय से, और भविष्य में भी ‘कुछ ना’ होन के भय से.... यही कारण होतें है, या पक्के तौर पर इन्हीं में से किसी कारण से ... इन डरों से पलायन करते हुए, हम बड़े आतुर रहते हैं... लालच रहता है कोई विश्वास या धारणा या ‘मत‘ मान लें, स्वीकार कर लें...

परन्तु, किसी विश्वास या धारणा को स्वीकार करने से, क्या हम स्वयं को समझ सकते हैं? जबकि इसके विपरीत.. एक विश्वास या धारणा, चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक, यह बिल्कुल साफ है कि धारणा या विश्वास हमें स्वयं को समझने में बाधक रूकावट बनते हैं। यह एक ऐसी धंुधली परत की तरह हैं जिसके पार से, हम अपने आपको देखते हैं ।
क्या हम अपने ‘स्व’ को बिना विश्वास या धारणा के देख सकते हैं? अगर हम इन धारणाओं को हटा दें, इन सभी विश्वासों-धारणाओं को हटा दें... जो कि कोई भी आदमी मान या ओढ़ सकता है... तो क्या देखने को कुछ बाकी रह जाता है?
यदि हम कोई भी विश्वास या धारणा नहीं रखें, जिन्हें कि हमारा मन मानता है, जिनके रूप में अपने को पहचानता है तो बिना किसी पहचान के वह मन अपने आप को वैसा ही देखने में समर्थ/ सक्षम हो जाता है... जैसा कि वह वास्तविकता में, यथारूप है, और तब निश्चित ही तब ही हम खुद को समझने की शुरूआत करते हैं।
Belief hinders true understanding
If we had no belief, what would happen to us? Shouldn't we be very frightened of what might happen? If we had no pattern of action based on a belief either in God, or in communism, or in socialism, or in imperialism, or in some kind of religious formula, some dogma in which we are conditioned, we should feel utterly lost, shouldn't we? And is not this acceptance of a belief the covering up of that fear - the fear of being really nothing, of being empty? After all, a cup is useful only when it is empty; and a mind that is filled with beliefs, with dogmas, with assertions, with quotations, is really an uncreative mind; it is merely a repetitive mind. To escape from that fear - that fear of emptiness, that fear of loneliness, that fear of stagnation, of not arriving, not succeeding, not achieving, not being something, not becoming something, is surely one of the reasons, is it not, why we accept beliefs so eagerly and greedily? And, through acceptance of belief, do we understand ourselves? On the contrary. A belief, religious or political, obviously hinders the understanding of ourselves. It acts as a screen through which we look at ourselves. And can we look at ourselves without beliefs? If we remove these beliefs, the many beliefs that one has, is there anything left to look at? If we have no beliefs with which the mind has identified itself, then the mind, without identification, is capable of looking at itself as it is, and then surely there is the beginning of the understand of oneself.
J. Krishnamurti, The Book of Life

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