24 Apr 2016

हमारी दुनियां जैसी है, वो ऐसी क्यों है? मिलजुलकर सोच विचार, जांच पड़ताल अनुसंधान की क्या जरूरत है?

आदर्श, मान्यताओं और श्रद्धा आस्था आदि में एक चीज काॅमन है वह है '‘पूर्वाग्रह''- हमें मिलजुलकर सोच-विचार करने के लिए सक्षम होना चाहिए- लेकिन हमारे पूर्वाग्रह, हमारे आदर्श आदि उस क्षमता और उर्जा को सीमित करते हैं जो मिलजुलकर सोच-विचार, जाँच-पड़ताल करने के लिए आवश्यक होती है- 
संसार भर में फैले-पसरे भ्रम-अव्यवस्था, दुर्दशा, आतंक, विनाश और भयावह हिंसा के पीछे क्या निहितार्थ हैं? इसके बारे में सोचने-विचारने, इसका अवलोकन और जाँच-पड़ताल करने के लिए हमें पूर्वाग्रह रहित उर्जा से सक्षम होना होता है- और हमारे सामने ही घट रहे केवल बाहरी तथ्यों से नहीं बल्कि हमारे भीतर अंतःस्तल तक गहराई में जो हो रहा है, इन सब बातों का महत्व या क्या अभिप्राय है- इसे हम सब को मिलजुलकर ही जानना समझना होगा, ना कि आप किसी और दिशा में सोचे और मैं किसी और दिशा में... बल्कि एकसाथ एकजुट होकर प्रत्येक तथ्य का जो एकमात्र सत्य है उसे जानना होगा। यह अवलोकन, यह जाँच पड़ताल प्रभावित, बाधित होती है अगर हम अपने-अपने पूर्वाग्रहों से, अपने विशेष अनुभवों, अपने निष्कर्षों से चिपके-चिपटे रहें.
क्योंकि जिस तरह दुनियां विखण्डित हो रही है, जिस तरह संसार का पतन या ह्रास होता दिख रहा है, जिस तरह दुनियां में नैतिकता का संवेदना‘भाव खो गया है, जिस दुनियां में कुछ भी पवित्र पावन दिव्य शेष नहीं रहा, जहां कोई अन्य किसी का मान-सम्मान नहीं कर रहा... ऐसे संसार के बारे में, मिलजुलकर सोचना- विचारना अत्यंत ही जरूरी हो गया है। केवल सतही या किसी फैशन की तरह औपचारिक रूप से नहीं बल्कि गहराई से हमें दुनियां की इस हालत, इसमें निहित अर्थों के बारे में जानना समझना होगा।
हमें यह पता लगाना होगा कि हजारों बरस के विकास के बाद - आप मैं और सारी दुनिया, इतनी हिंसक, र्निदयी या बेरहम, विध्वंसक क्यों हो गई है, क्यों हम हमेशा युद्धों में रत रहते हैं। परमाणु बम बनाते रहते हैं। तकनीकी जगत टेक्नोलाॅजिकली में हमने ज्यादा से ज्यादा प्रगति की है- क्या इसलिए, क्या यही वह एक वजह है जो संसार की आदमी की ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार है- तो आइये सोचें विचारें, मेरे हिसाब से या आप अपने हिसाब से नहीं, बल्कि मिलजुलकर - अपने छोटे-छोटे दिमागों में मौजूद बुद्धि की, सोचने-विचारने की आम क्षमता से.

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18 Feb 2016

ऊर्जापूरित मन की र्निद्वंद्व गति

            तो अब, हम उस ऊर्जा को अपने भीतर कैसे जगाएं जिसकी अपनी ही रौ या गति होती है, जिसके अपने ही कारण और प्रभाव होते हैं, ऐसी ऊर्जा जिसके मार्ग में कोई प्रतिरोध नहीं होता, जिसका क्षय भी नहीं होता? कोई कैसे उस ऊर्जा तक पहुंचे?
            संगठित धर्म कई तरह के तरीकों विधियों की वकालत करते हैं, और कहते हैं कि किसी खास तरह के अभ्यास से कोई उस ऊर्जा को उपलब्ध हो सकता है. लेकिन तरीका आपको यह ऊर्जा नहीं देता. किसी भी विधि के अभ्यास में तद्नुकूलन अनुरूप होना, प्रतिरोध, नकार, स्वीकार्य, सामंजस्य आदि बातें निहित होती हैं ... इसमें किसी में जो भी ऊर्जा है वह भी पूरी झोंक दी जाती है तो इस अंतद्वद्व में कुछ भी शेष नहीं रह जाता.             यदि आप इस सत्य को देख समझ पा रहें हैं तो आप कभी भी किसी विधि का अभ्यास नहीं करेंगे. 
            दूजी बात यह है कि यदि ऊर्जा का कोई उद्देश्य है, कोई एक अंत है जिसकी और वह बहती है, तो ऐसी ऊर्जा आत्मविध्वंसक होती है. और हम में से बहुतों के लिए ऊर्जा का एक लक्ष्य होता है, उद्देश्य होता है...क्या ऐसा नहीं होता? हम किसी उपलब्धि की इच्छा से गति करते हैं, चलते हैं.. ये और वो होने के लिए, इसलिए हमारा ऊर्जा अपने ही पराभव का कारण बनती है. 
            तीसरी बात यह है कि जब ऊर्जा अतीत के अनुकूल—अनुरूप होने में लगती है तो यह मंदता, क्षीणता और तुच्छता को प्राप्त होती है— और यही है जो हमारी सबसे बड़ी समस्या या कठिनाई है.
            अतीत में न केवल असंख्य बीते कल होते हैं, बल्कि वह प्रत्येक मिनट भी होता है जो चाहे—अनचाहे यादों स्मृतियों के रूप में इकट्ठा हुआ और उन चीजों की यादें भी जो अभी क्षण भर पहले संजोई. दिलदिमाग में मन में, यादों के इस ढेर को संजोने बनाये रखने में भी ऊर्जा का नाश होता है. तो इस ऊर्जा को जगाने के लिए, मन में किसी भी तरह का प्रतिरोध नहीं होना चाहिए, ना कोई उद्देश्य, ना दृष्टि में किसी तरह का अंत या लक्ष्य, और मन ''बीते कल, आज और आने वाले कल के रूप में'' समय के जाल में भी नही उलझा होना चाहिए.             तब ऊर्जा निरंतर अपने आप को नया बनाये रहती है और तब उसका क्षय या नाश भी नहीं होता. उस तरह का मन किसी प्रतिबद्धता में नहीं होता, वह पूर्णतया मुक्त होता है. और केवल इस तरह का मन ही होता है जो उस अनाम, निराली ही गति को प्राप्त हो पाता है, जो शब्दों से परे है. 
           मन यदि 'अज्ञात' में प्रवेश चाहता है, तो उसे अनिवार्यत: 'ज्ञात' से पूर्णतया मुक्त होना होता है.
 
 
To awaken this energy, the mind must have no resistance
Now, how do we awaken in ourselves an energy that has its own momentum, that is its own cause and effect, an energy that has no resistance and does not deteriorate? How does one come by it? The organized religions have advocated various methods, and by practicing a particular method one is supposed to get this energy. But methods do not give this energy. The practice of a method implies conformity, resistance, denial, acceptance, adjustment, so that whatever energy one has is merely wearing itself out. If you see the truth of this, you will never practice any method. That is one thing. Secondly, if energy has a motive, an end towards which it is going, that energy is self-destructive. And for most of us, energy does have a motive, does it not? We are moved by a desire to achieve, to become this or that, and therefore our energy defeats itself. Thirdly, energy is made feeble, petty, when it is conforming to the past -and this is perhaps our greatest difficulty. The past is not only the many yesterdays but also every minute that is being accumulated, the memory of the thing that was over a second before. This accumulation in the mind is also destructive of energy.
So, to awaken this energy, the mind must have no resistance, no motive, no end in view, and it must not be caught in time as yesterday, today, and tomorrow. Then energy is constantly renewing itself and therefore not degenerating. Such a mind is not committed, it is completely free, and it is only such a mind that can find the unnameable, that extraordinary something which is beyond words. The mind must free itself from the known to enter into the unknown.

Collected Works, Vol. XIII,337,Choiceless Awareness 

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4 Feb 2016

जब तक आप बदलाव चाहेंगे - बोर होंगे ... दुखी होंगे


एक मन जो किसी तरह के परिवर्तन'बदलाव की फिराक में नहीं रहता, उस मन में ही कोई भय नहीं होता.
अगर्व या विनम्रता में संपूर्ण संहार समाहित है— बाहरी ही नहीं, सामाजिक चीजें ही नहीं बल्कि केन्द्र का ही पूरी तरह नष्ट हो जाना, 'मैं' 'मेरा' का नाश, अपने विचारों, अनुभवों, ज्ञान और परंपराओं का विनाश हो जाना और मन का उन सारी चीजों से खाली या रहित हो जाना...जिन्हें वो जानता है...जिनसे मन की पहचान है जिनसे मन..मन है. इस तरह का मन, फिर बदलाव की भाषा में नहीं सोचता।
ऐसा मन जिसे किसी तरह के बदलाव से कोई सरोकार नहीं रह जाता, उसे भय नहीं होता और इसलिए वह पूरी तरह मुक्त होता है. तब वह अपने को किसी अन्य रूप में बदलने, किसी अन्य ढर्रे सा सांचे में ढालने की कोशिश नहीं करता, ना ही वह किसी अनुभव की तलाश में रहता है, ना ही किसी चीज के बारे में कहता'सुनता या किसी तरह की मांग रखता है... तो ऐसा मन पूरी तरह मुक्त होता है... वह ही शांत,स्थिर अचल होता है.. और तब, कदाचित वह अस्तित्व में आता है जो अनाम है..
तो विनम्रता आवश्यक है, लेकिन कृत्रिम, संवर्धित की हुर्इ् बोई उगाई'पाली'पोसी गई विनम्रता नहीं. तो आप देखें कि किसी को अनिवार्यत: पूरी तरह अक्षम होना होता है... बिना​ किसी सौभाग्य के... अन्दर से पूरी तरह ... नाकुछ.. और मेरे ख्याल से यदि कोई इस सब को ऐसे देखे कि ना कुछ होने या बनने की कोशिश नहीं करनी है... तो यह देखना ही उसका अनुभव बन जाता है... और तब हो सकता है कि वह दूसरी चीज भी अस्तित्व में आ जाए।


A mind that is no longer concerned with change has no fear:
 

Humility implies total destruction - not of outward, social things, but complete destruction of the center, of oneself, of one's own ideas, experiences, knowledge, traditions - completely emptying the mind of everything that it has known. Therefore, such a mind is no longer thinking in terms of change.

A mind that is no longer concerned with change has no fear and is therefore free. Then it is no longer trying to change itself into another pattern, no longer exposing itself to further experiences, no longer asking and demanding, because such a mind is free; therefore, it can be quiet, still. And then, perhaps, that which is nameless can come into being.

So, humility is essential, but not of the artificial, cultivated kind. You see, one must be without capacity, without gift; one must be as nothing, inwardly. And, I think that if one sees this without trying to learn how to be as nothing, then the seeing is the experiencing of it and then, perchance, the other thing can come into being.
- J. Krishnamurti, Collected Works, Vol. XII,200

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25 Jan 2016

ईश्वर से प्रेम कैसे करें?


ईश्वर को पाने'तलाशने के लिए आपको जानना ही होगा कि प्रेम कैसे करें. ईश्वर से प्रेम कैसे करें? यह नहीं बल्कि यह भी कि अपने आसपास के इंसानों से प्रेम कैसे करें, पेड़पौधों, फूलों​'पत्तियों, चिड़ियों'तितलियों से प्रेम कैसे करें? जब आप वाकई इन सब से प्यार करना सीख जाएंगे तो आप सचमुच यह भी जान जाएंगे कि ईश्वर से प्यार कैसे किया जाता है. बिना किसी से प्यार किये, बिना यह जाने कि किसी दूसरे के साथ रहने'जुड़ने या साहचर्य का मतलब क्या होता है, आप यह नहीं जान सकते कि सत्य से जुड़ना या योग क्या होता है।

To find God you must know how to love, not God, but the human beings around you, the trees, the flowers, the birds. Then, when you know how to love them, you will really know what it is to love God. Without loving another, without knowing what it means to be completely in communion with one another, you cannot be in communion with truth.
~ Jiddu Krishnamurti
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10 Jan 2016

स्वतंत्रता की प्रकृति क्या है? यह क्यों घटित होती है?

प्रश्न : स्वतंत्रता की प्रकृति क्या है? यह क्यों घटित होती है?
उत्तर : स्वतंत्रता की प्रकृति क्या है? जब अंग्रेज यहां से चले गये तो आपने स्वतंत्रता पाई, तो आपने इस आजादी का क्या किया? आपका स्वतंत्रता से आशय क्या है? क्या ये कि हम जो मर्जी आये करें? जो कि आप कर रहे हैं. चिंता से आजादी? पीड़ा से आजादी? शारीरिक पीड़ा से आजाद होना, मुक्ति पाना तुलनात्मक रूप से आसान है; किसी चिकित्सक के पास जाईये और ठीक हो जाईये या यदि आप किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हैं तो आप उसे स्वीकार कर लेते हैं और उसे ढोते रहते हैं. तो स्वतंत्रता क्या है? क्या स्वतंत्रता कोई ऐसी चीज है जो 'स्वतंत्र नहीं होने से' अलग है. हम मोह से मुक्त हो सकते हैं यह बहुत ही आसान है; हो सकता है मैं किसी भार से मुक्त हो जाउं,लेकिन यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है;  लेकिन स्वतंत्रता आखिर है क्या? जब आप स्वतंत्र मुक्त होते हैं तो क्या आप इस बात को जानते हैं, क्या आपको इस बात का भान होता है कि आप मुक्त हैं, आजाद हैं? मुझे आश्चर्य होता है यदि आप इस प्रश्न को समझें. जब आप कहते हैं कि मैं बहुत ही खुश हूं...यदि आप कभी खुश हुए हों...क्या वह वाकई खुशी होती है, या आप यह तब कह पाते हैं जब खुशी गुजर चुकी, चली गई होती है... आपके पास एक विचार के रूप में रह जाती है. क्या आपने कभी भी जाना... पहचाना, या सम्पूर्ण स्वतंत्रता को महसूस अनुभव किया (किसी चीज से नहीं) आजादी... जब आप कहते हैं कि मैं पूरी तरह मुक्त हूॅं, तब आप मुक्त नहीं होते. यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति कहे कि 'मैं जानता हूं'; क्योंकि तब वह वाकई में कुछ नहीं जानता.
तो स्वतंत्रता कुछ ऐसा है जो अनुभव नहीं किया जा सकता. जैसे कि 'मोक्ष' बुद्धत्व को अनुभव नहीं किया जा सकता. क्योंकि जहां भी अनुभव हो, कोई अनुभव करने वाला होता है; और अनुभव करने वाला, अनुभव को जानता पहचानता है, अन्यथा वह अनुभव ही ना कहलाये. तो स्वतंत्रता या आजादी कोई अनुभव नहीं है. यह 'अस्तित्व' या 'होने की' एक अवस्था है, ना कि ऐसी अवस्था जो कभी कहीं भविष्य में होगी.

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सब आप पर निर्भर है

हालांकि कम से कम कुछ लोग तो हमेशा ही होते हैं, जो मशाल जलाये रखते हैं. इतना ही काफी सबकुछ है.
हो सकता है, आप ही वो हों. सब आप पर निर्भर है.
At least there can be few who will keep the light burning. That is all. But that is up to you, Sirs.
~K 1.2.1968
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