4 Feb 2016

जब तक आप बदलाव चाहेंगे - बोर होंगे ... दुखी होंगे


एक मन जो किसी तरह के परिवर्तन'बदलाव की फिराक में नहीं रहता, उस मन में ही कोई भय नहीं होता.
अगर्व या विनम्रता में संपूर्ण संहार समाहित है— बाहरी ही नहीं, सामाजिक चीजें ही नहीं बल्कि केन्द्र का ही पूरी तरह नष्ट हो जाना, 'मैं' 'मेरा' का नाश, अपने विचारों, अनुभवों, ज्ञान और परंपराओं का विनाश हो जाना और मन का उन सारी चीजों से खाली या रहित हो जाना...जिन्हें वो जानता है...जिनसे मन की पहचान है जिनसे मन..मन है. इस तरह का मन, फिर बदलाव की भाषा में नहीं सोचता।
ऐसा मन जिसे किसी तरह के बदलाव से कोई सरोकार नहीं रह जाता, उसे भय नहीं होता और इसलिए वह पूरी तरह मुक्त होता है. तब वह अपने को किसी अन्य रूप में बदलने, किसी अन्य ढर्रे सा सांचे में ढालने की कोशिश नहीं करता, ना ही वह किसी अनुभव की तलाश में रहता है, ना ही किसी चीज के बारे में कहता'सुनता या किसी तरह की मांग रखता है... तो ऐसा मन पूरी तरह मुक्त होता है... वह ही शांत,स्थिर अचल होता है.. और तब, कदाचित वह अस्तित्व में आता है जो अनाम है..
तो विनम्रता आवश्यक है, लेकिन कृत्रिम, संवर्धित की हुर्इ् बोई उगाई'पाली'पोसी गई विनम्रता नहीं. तो आप देखें कि किसी को अनिवार्यत: पूरी तरह अक्षम होना होता है... बिना​ किसी सौभाग्य के... अन्दर से पूरी तरह ... नाकुछ.. और मेरे ख्याल से यदि कोई इस सब को ऐसे देखे कि ना कुछ होने या बनने की कोशिश नहीं करनी है... तो यह देखना ही उसका अनुभव बन जाता है... और तब हो सकता है कि वह दूसरी चीज भी अस्तित्व में आ जाए।


A mind that is no longer concerned with change has no fear:
 

Humility implies total destruction - not of outward, social things, but complete destruction of the center, of oneself, of one's own ideas, experiences, knowledge, traditions - completely emptying the mind of everything that it has known. Therefore, such a mind is no longer thinking in terms of change.

A mind that is no longer concerned with change has no fear and is therefore free. Then it is no longer trying to change itself into another pattern, no longer exposing itself to further experiences, no longer asking and demanding, because such a mind is free; therefore, it can be quiet, still. And then, perhaps, that which is nameless can come into being.

So, humility is essential, but not of the artificial, cultivated kind. You see, one must be without capacity, without gift; one must be as nothing, inwardly. And, I think that if one sees this without trying to learn how to be as nothing, then the seeing is the experiencing of it and then, perchance, the other thing can come into being.
- J. Krishnamurti, Collected Works, Vol. XII,200

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25 Jan 2016

ईश्वर से प्रेम कैसे करें?


ईश्वर को पाने'तलाशने के लिए आपको जानना ही होगा कि प्रेम कैसे करें. ईश्वर से प्रेम कैसे करें? यह नहीं बल्कि यह भी कि अपने आसपास के इंसानों से प्रेम कैसे करें, पेड़पौधों, फूलों​'पत्तियों, चिड़ियों'तितलियों से प्रेम कैसे करें? जब आप वाकई इन सब से प्यार करना सीख जाएंगे तो आप सचमुच यह भी जान जाएंगे कि ईश्वर से प्यार कैसे किया जाता है. बिना किसी से प्यार किये, बिना यह जाने कि किसी दूसरे के साथ रहने'जुड़ने या साहचर्य का मतलब क्या होता है, आप यह नहीं जान सकते कि सत्य से जुड़ना या योग क्या होता है।

To find God you must know how to love, not God, but the human beings around you, the trees, the flowers, the birds. Then, when you know how to love them, you will really know what it is to love God. Without loving another, without knowing what it means to be completely in communion with one another, you cannot be in communion with truth.
~ Jiddu Krishnamurti
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10 Jan 2016

स्वतंत्रता की प्रकृति क्या है? यह क्यों घटित होती है?

प्रश्न : स्वतंत्रता की प्रकृति क्या है? यह क्यों घटित होती है?
उत्तर : स्वतंत्रता की प्रकृति क्या है? जब अंग्रेज यहां से चले गये तो आपने स्वतंत्रता पाई, तो आपने इस आजादी का क्या किया? आपका स्वतंत्रता से आशय क्या है? क्या ये कि हम जो मर्जी आये करें? जो कि आप कर रहे हैं. चिंता से आजादी? पीड़ा से आजादी? शारीरिक पीड़ा से आजाद होना, मुक्ति पाना तुलनात्मक रूप से आसान है; किसी चिकित्सक के पास जाईये और ठीक हो जाईये या यदि आप किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हैं तो आप उसे स्वीकार कर लेते हैं और उसे ढोते रहते हैं. तो स्वतंत्रता क्या है? क्या स्वतंत्रता कोई ऐसी चीज है जो 'स्वतंत्र नहीं होने से' अलग है. हम मोह से मुक्त हो सकते हैं यह बहुत ही आसान है; हो सकता है मैं किसी भार से मुक्त हो जाउं,लेकिन यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है;  लेकिन स्वतंत्रता आखिर है क्या? जब आप स्वतंत्र मुक्त होते हैं तो क्या आप इस बात को जानते हैं, क्या आपको इस बात का भान होता है कि आप मुक्त हैं, आजाद हैं? मुझे आश्चर्य होता है यदि आप इस प्रश्न को समझें. जब आप कहते हैं कि मैं बहुत ही खुश हूं...यदि आप कभी खुश हुए हों...क्या वह वाकई खुशी होती है, या आप यह तब कह पाते हैं जब खुशी गुजर चुकी, चली गई होती है... आपके पास एक विचार के रूप में रह जाती है. क्या आपने कभी भी जाना... पहचाना, या सम्पूर्ण स्वतंत्रता को महसूस अनुभव किया (किसी चीज से नहीं) आजादी... जब आप कहते हैं कि मैं पूरी तरह मुक्त हूॅं, तब आप मुक्त नहीं होते. यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति कहे कि 'मैं जानता हूं'; क्योंकि तब वह वाकई में कुछ नहीं जानता.
तो स्वतंत्रता कुछ ऐसा है जो अनुभव नहीं किया जा सकता. जैसे कि 'मोक्ष' बुद्धत्व को अनुभव नहीं किया जा सकता. क्योंकि जहां भी अनुभव हो, कोई अनुभव करने वाला होता है; और अनुभव करने वाला, अनुभव को जानता पहचानता है, अन्यथा वह अनुभव ही ना कहलाये. तो स्वतंत्रता या आजादी कोई अनुभव नहीं है. यह 'अस्तित्व' या 'होने की' एक अवस्था है, ना कि ऐसी अवस्था जो कभी कहीं भविष्य में होगी.

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