9 Apr 2014

साध्य और साधन भिन्न या अलग नहीं होते

हम इतिहास का अध्ययन करते हैं और ऐतिहासिक तथ्यों का अपनी पूर्वधारणाओं के अनुसार अनुवाद कर लेते हैं, लेकिन भविष्य के प्रति सुनिश्चित होता एक भ्रांति है। मनुष्य केवल किसी एक प्रभाव का परिणाम नहीं है, वह व्यापक रूप से जटिल है ; और अन्य को न्यून आंकते हुए केवल किसी एक प्रभाव को बढ़ा-चढ़ा कर देखना एक असंतुलन पैदा करता है, जो हमें और भी अव्यवस्था और विपदाओं में ले जाएगा। मनुष्य एक संपूर्ण प्रक्रिया है। तो इस संपूर्णता को समझना ही होगा, ना कि इसका कोई एक हिस्सा... हालांकि चाहे कोई हिस्सा अस्थायी रूप से कितना ही महत्वपूर्ण क्यों ना हो। किसी भविष्य के लिए वर्तमान से समझौता करना उन लोगों का पागलपन है, जो सत्ता-शक्ति मिलने से पागल हैं और ताकत एक बहुत बड़ी बुराई है। ये लोग मानवता की दिशा तय करने के लिए खुद को सही साबित करने पर तुले रहते हैं, ये लोग नई तरह के पंडित हैं। साधन और साध्य अलग नहीं हैं, ये एक ही संयुक्त तथ्य है। साधन ही साध्य का सृजन करता है। हिंसा के द्वारा शांति नहीं हासिल की जा सकती। पुलिसिया व्यवस्था द्वारा नियंत्रित राज्य शांतिपूर्ण नागरिक नहीं पैदा कर सकता। विवश करके, आजादी हासिल नहीं की जा सकती। यदि कोई पार्टी संपूर्णतः शक्तिसंपन्न है, तो वह एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर सकती क्योंकि वर्गविहीन समाज किसी तानाशाही से नहीं पाया जा सकता। यह सब सहज ही समझ में आ जाना चाहिए। 


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1 Apr 2014

नवीन मौलिक की खोज


एक सीखा-सिखाया आदमी, चाहे वह कितना ही विद्वान या पंडित हो, विकिपीडिया से भरा हो.... अगर वह प्रेम-प्यार नहीं जानता, तो उसका सारा ज्ञान बकवास या व्यर्थ है.. वह केवल किताबी कीड़ा है। एक आदमी जो किसी तरह के विश्वास या श्रद्धा या मत के अनुसार, किसी धर्मसम्प्रदाय के हिसाब से चलने वाला है वह सीमित या बंधा होगा कहीं ना कहीं गुलाम होगा क्योंकि यदि किसी विश्वास के अनुसार ही अनुभव करता हो.. तो उसके अनुभव, कितने ही दिव्य अनुभव हों... उसे मुक्त नहीं करते। इसके विपरीत विश्वास, धर्म आधारित तथाकथित आध्यात्मिक अनुभव बांधते ही हैं। और सब तरह से मुक्त होना ही किसी नये, नवीन मौलिक की खोज में सहायक हो सकता है।

A man of learning, however erudite, however encyclopaedic his knowledge may be, if he has no love, surely his knowledge is worthless; it is merely book learning. A man of belief, as we discussed, must inevitably shape his life according to the dogma, the tenet, that he holds, and therefore his experience must be limited; because, one experiences according to one's beliefs, and such experience can never be liberating. On the contrary, it is binding. And, as we said, only in freedom can we discover anything new, anything fundamental.

J. Krishnamurti The Collected Works Volume V

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26 Mar 2014

अगर आप अहसास को कोई नाम ना दें


जब आप किसी अहसास या भाव को देखें, तो वह स्वतः ही विलीन हो जाता है। लेकिन जब किसी अहसास के समाप्ति के बाद भी, यदि वहाँ कोई अहसास को देखने वाला होता है, एक दर्शक होता है, महसूस करने वाला या एक एक विचारक होता है जो उस मूल बीते अहसास से अलग... उस अहसास की स्मृति बन रहता है...तो वहां पर भी द्वंद्व होता है। तो बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह समझना कि हम किसी अहसास को, भाव को किस तरह देखते हैं। तो पल भर के लिए हम एक बहुत ही सामान्य अहसास या भाव या अनुभूति -जलन को लें। हम सब जानते हैं कि जलन क्या होती है या एक जलकुकड़ा होना क्या होता है। तो अब आप अपनी जलन को देखे... इसे आप कैसे देखते हैं? जब आप इस भाव को देखते हैं, आप जलन के अवलोकनकर्ता होते हैं... अपने आप से कुछ अलग। आप जलन को बदलने या उसके प्रारूप में बदलाव की कोशिश करते हैं, या उस जलन की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं... आप देखिये कि आप किस तरह अपनी जलन को न्यायसंगत तर्कसंगत दिखाने की कोशिश करते हैं ... इसी तरह अन्य बातें। तो यहां पर एक तो अस्तित्व होता है, संवेदक होता है और एक चीज होती है जलन से अलग... जो कि जलन को देखती है। कुछ पल के लिए जलन गायब हो जाती है, पर फिर पुनः लौट आती है... वह लौट आती है इसलिए कि आप वाकई उसकी ओर उस तरह नहीं देखते कि वह आपका ही हिस्सा है, आप ही हैं।

तो मैं यह कहना चाहता हूं कि जिस क्षण आप उस भाव को एक नाम देते हैं, किसी अहसास पर एक लेबल लगा देते हैं... आप पुनः अतीत के ढांचे से निकालकर उसे अतीत का ही सातत्य दे देते हैं। अतीत का वह ढांचा क्या है ? वह है . आपका वह दर्शक होना... वह अलग अपनी ही छवि जो शब्दों, कल्पनाओं और क्या सही है? और क्या गलत? के विचारों के भेद से बनी है। किन्तु यदि आप भाव को या अहसास को नाम नहीं देते जिसके लिए कि बहुत ही होशपूर्ण होने की आवश्यकता है ... तो तुरन्त ही आप समझ के एक अन्य ही आयाम में पहुंच जाते हैं जहां अवलोकनकर्ता नहीं होता, विचारक नहीं होता... वह केन्द्र नहीं होता, जहां से आप निर्णय करते हैं... जहां आप जानते हैं कि आप अहसास से अलग-कुछ  नहीं हैं.. तब वहां कोई भी ‘मैं’ नहीं होता जो किसी अहसास को महसूसता है। 


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