6 Nov 2009

अनवधान के प्रति जागरूक होना



हमारा देखना और सुनना, अवधान... ध्यान का ही एक प्रकार है और ध्यान की कोई सीमा नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं इसलिए यह असीम है। ध्यान के लिए अथाह ऊर्जा लगती है जो एक ही बिन्दु पर टिकी न हो। इस अवधान में पुनरावृत्ति करने वाले कोई भी क्षण नहीं, यह यांत्रिक नहीं। इसलिए इस प्रकार का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि अवधान या ध्यान को कैसे संभाला या जारी रखा जाये, और जब कोई देखने और सुनने के कला सीख लेता है यह ध्यान या अवधान स्वतः ही अपने को किसी पेज पर, किसी भी शब्द पर फोकस करने में समर्थ होता है। इसमें किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं होता जो कि एकाग्रता की गतिविधि में होता है। अनवधान को परिष्कृत करके अवधान में नहीं बदला जा सकता। अनवधान के प्रति जागरूकता यानि अनवधान का अंत न कि अनवधान, अवधान हो जायेगा। इस समाप्ति में ही निरंतरता नहीं रहती। अतीत अपने आपको भविष्य में बदल लेता है - कुछ हो जाने की निरंतरता में, और हम निरंतरता में ही सुरक्षितता ढूंढते हैं, समाप्ति में नहीं। तो ध्यान या अवधान में निरंतरता का गुण नहीं होता। जो भी निरंतर चलता रहता है वह यांत्रिक है। यह होना यांत्रिक है और इसमें समय लागू होता है। ध्यान में समय का गुण भी नहीं है। यह सब एक अत्यंत जटिल विषय है। कोई भी इसमें बड़े होले-होले, धीरे-धीरे ही गहराई तक जा सकता है।

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