27 Nov 2009

खोज की समाप्ति End of search



आपको इस नीरवता की अवस्था में आना ही चाहिए अन्यथा आप वास्तव में धार्मिक व्यक्ति नहीं हैं, इसी अमित मौन के पार वह है जो पवित्र पावन है।
धार्मिक मन वह मन है जो अज्ञात में प्रवेश कर चुका है, और आप अज्ञात में छलांग लगाकर नहीं आ सकते, आप सावधानीपूर्वक गणित बैठाकर अज्ञात में प्रवेश नहीं कर सकते...
आप यह जानना ही चाहिये कि सत्य क्या है? क्योंकि यही वह चीज है जो महत्वपूर्ण और अर्थवान है, यह नहीं कि आप अमीर हैं या गरीब, आप खुशहाली शादीशुदा जिन्दगी जी रहे हैं या आपके बच्चे है या नहीं, क्यों वह सब समाप्त हो जायेगा, वहां निश्चित ही मृत्यु है। तो किसी भी विश्वास या मान्यता के किसी भी रूप के बगैर आपको सच खोजना ही पड़ेगा।
धर्म भलमनसाहत का अहसास है, वह प्रेम जो नदी की तरह है, जीवन्त, नित्य प्रवाहमान। इसी अवस्था में एक ऐसा क्षण आता है जिसमें आप पाएंगे कि अब कोई खोज शेष नहीं रही, और इस खोज की समाप्ति में ही उसकी शुरूआत है जो सर्वथा अनूठा है।

उस गड्ढे से निकलिये जो आपने अपने लिये स्वयं खोदा है...

ईश्वर की खोज, सत्य की खोज, सम्पूर्ण रूप से भले हो जाने के अहसास की खोज धर्म है - ना कि अच्छाई, नम्रता आदि गढ़ना विकसित करना धर्म है। मन की खोजों और चालाकियों से परे, किसी अनाम का अहसास, उसमें जीना, वही आपका अस्तित्व होना - यही सच्चा धर्म है। लेकिन आप यह तभी कर सकते हैं जब आप उस गड्ढे से निकले जो आपने अपने लिये खोदा है और जीवन की नदी की तरफ बढ़ें, तब जीवन के पास आपको संभालने का अपना आश्चर्यजनक तरीका है, क्योंकि तब आप खुद की संभाल की जिम्मेदारी अपने पास नहीं रखते। जीवन अपनी इच्छा से आपको जहां चाहे वहां ले जाता है क्योंकि आप उसी का हिस्सा हैं, तब आपको सुरक्षा की समस्या नहीं रहती, तब आपको यह समस्या नहीं रहती कि कौन आपके बारे में क्या कहता है और क्या नहीं कहता, और यही जीवन का सौन्दर्य है।

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