21 Mar 2014

मरने के भय ?

क्या आप सोचते हैं कि एक चिड़िया मरने के भय में जीती है? क्या आपका यह ख्याल है कि एक पीली पत्ती जो जमीन पर गिरने ही वाली है,मरने से डरती है? हालांकि वो भी जब मौत आती है मरती हैं ... पर मौत आने के तुरंत पहले तक उसका मौत से कोई वास्ता नहीं होता, वह जीने में बेतहाशा संलग्न होती है— कीट—पतंगों के शिकार में, घोंसला बनाने में, चीं चीं चीं चीं मधुर गीत गाने में, और उंची उंची उड़ाने भरने में ... उन उंचाइयों पर उड़ने का आनंद लेती हैं.. जहां केवल, पर फैलाने होते हैं, हवाओं के संग ही बहना होता है...हवाओं की सवारी भर करनी होती है. आखिर तक चिड़िया जीवन के सारे मज़े लेती हैं। वो मौत के बारे में कभी नहीं सोचती. अगर मौत आए, तो ठीक, वह खत्म हो जाती है. तो यहां उस सोच से कोई सरोकार नहीं होता जिसमें 'अब क्या होगा?' का प्रश्न है.... यहां क्षण प्रतिक्षण.. का जीना है. क्या चिड़िया या पेड़ पर लहलहाती एक पत्ती, यही नहीं करते? लेकिन इंसान ही ऐसा है जो हमेशा मौत के बारे में सोचता विचारता है— क्योंकि हम जीते नहीं हैं. यही समस्या है— हम मर रहे हैं प्रतिपल..हम जीते नहीं.


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