29 Dec 2008

अज्ञात, ज्ञात द्वारा अमापनीय है। समय, समयातीत को नहीं माप सकता। उस सनातन, अपरिमित को जिसका आदि और अंत नहीं है। पर हमारा मन कल, आज और कल की मापन इकाई (गज) से बंधा हुआ है और इस गज से हम अज्ञात को जानने में लगे हैं, उस चीज को मापने की कोशिश कर रहे हैं जो अपरिमित है अमापनीय है। और जब हम किसी अपरिमित को मापने को कोशिश करते हैं तो सिवा शब्दों के हमारे हाथ कुछ नहीं आता।
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एक धार्मिक व्यक्ति वो व्यक्ति नहीं जो भगवान को ढूंढ रहा है। धार्मिक आदमी समाज के रूपांतरण से संबद्ध है, जो कि वह स्वयं है। धार्मिक आदमी वो व्यक्ति नहीं जो असंख्य रीति रिवाजों - परंपराओं को मानता/करता है। अतीत की संस्कृति, मुर्दा चीजों में जिंदा रहता है। धार्मिक आदमी वो व्यक्ति नहीं है जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता या बाईबिल की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर रहा है, सन्यास धारण कर रखा है - ये सारे तो वो व्यक्ति हैं जो तथ्य से पलायन कर रहे हैं, भाग रहे हैं। धार्मिक आदमी का संबंध कुल जमा, संपूर्ण रूप से समाज को जो कि वह स्वयं ही है, को समझने वाले व्यक्ति से है। वह समाज से अलग नहीं है। खुद के पूरी तरह, संपूर्ण रूप से रूपांतरण अर्थात् लोभ-अभिलाषाओं, ईष्र्या, महत्वाकांक्षाओं के अवसान द्वारा आमूल-रूपांतरण और इसलिए वह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, यद्यपि वह स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है - अर्थात् जो भोजन वह खाता है, जो किताबें वह पढ़ता है, जो फिल्में वह देखने जाता है, जिन धार्मिक प्रपंचों, विश्वासों, रिवाजों और इस तरह के सभी गोरखधंधों में वह लगा है। वह जिम्मेदार है, और क्योंकि वह जिम्मेदार है इसलिए धार्मिक व्यक्ति स्वयं को अनिवार्यतः समझता है, कि वो समाज का उत्पाद है समाज की पैदाईश है जिस समाज को उसने स्वयं बनाया है।इसलिए अगर यथार्थ को खोजना है तो उसे यहीं से शुरू करना होगा। किसी मंदिर में नहीं, किसी छवि से बंधकर नहीं चाहे वो छवि हाथों से गढ़ी हो या दिमाग से। अन्यथा कैसे वह कुछ खोज सकता है जो संूपर्णतः नया है, यथार्थतः एक नयी अवस्था है.
क्या हम खुद में धार्मिक मन की खोज कर सकते हैं। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में वास्तव में वैज्ञानिक होता है। वह अपनी राष्ट्रीयता, अपने भयों डर, अपनी उपलब्धियों से गर्वोन्नत, महत्वाकांक्षाओं और स्थानिक जरूरतों के कारण वैज्ञानिक नहीं होता। प्रयोगशाला में वह केवल खोज कर रहा होता है। पर प्रयोगशाला के बाहर वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होता है अपनी पूर्वअवधारणाओं, महत्वाकांक्षाओं, राष्ट्रीयता, घमंड, ईष्र्याओं और इसी तरह की अन्य बातों सहित। इस तरह के मन की पहुंच ‘धार्मिक मन’ तक कभी नहीं होती। धार्मिक मन किसी प्रभुत्व केन्द्र से संचालित नहीं होता, चाहे उसने पारंपरिक रूप से ज्ञान संचित कर रखा हो, या वह अनुभव हो (जो कि सच में परंपराओं की निरंतरता, शर्तों की निरंतरता ही है।) पंरपरा यानि शर्त, आदत।
धार्मिक सोच, समय के नियमों के मुताबिक नहीं होती, त्वरित परिणाम, त्वरित दुरूस्ती सुधराव सुधार समाज के ढर्रों के भीतर। धार्मिक मन रीति रिवाजी मन नहीं होता वह किसी चर्च-मंदिर-मस्जिद-गं्रथ, किसी समूह, किसी सोच के ढर्रे का अनुगमन नहीं करता।धार्मिक मन वह मन है जो अज्ञात में प्रवेश करता है और आप अज्ञात में नहीं जा सकते, छलांग लगा कर भी नहीं। आप पूरी तरह हिसाब लगाकर बड़ी सावधानीपूर्वक अज्ञात में प्रवेश नहीं कर सकते। धार्मिक मन ही वास्तव में क्रांतिकारी मन होता है, और क्रांतिकारी मन ‘जो है’ उसकी प्रतिक्रिया नहीं होता। धार्मिक मन वास्तव में विस्फोटक ही है, सृजन है। और यहां शब्द ‘सृजन’ उस सृजन की तरह न लें जिस तरह कविता, सजावट, भवन या वास्तुशिल्प, संगीत, काव्य या इस तरह की चीजें। ये सृजन की एक अवस्था में ही हैं।
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इस दुनियां में क्या हो रहा है? आपका ईश्वर ईसाई है, हिन्दू है, मुसलमान है। सबकी अपनी अपनी कल्पना के हिसाब से ईश्वर है और उसमें भी छोटे से छोटे अन्तर विशेष से सत्य का आग्रह करते हुए। कुछ लोगों के हाथों में ये विशेष सत्य शोषण का माध्यम, धर्म की दुकान बन जाता है। आप बारी बारी से हर दुकान पर जाते हैं, सब जांचते हैं, क्योंकि आप भला-बुरा देखने की समझ खोने के कगार पर हैं। क्योंकि आप बीमार हैं और आप इलाज चाहते हैं और आप किसी भी दुकान द्वारा पेश किये गये इलाज को स्वीकार करने के लिए खुद को मजबूर पा रहे हैं वो हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या और कोई। तो होता ये है कि आपका भगवान आप लोगों को बांट देता है, आपका ईश्वर में विश्वास आपको इंसानों-इंसानो में बांट दे रहा है कुछ आदमी हिन्दू, कुछ ईसाई, कुछ सिख। इसके बावजूद आप ईश्वर के नाम पर भाईचारे की बात करते हैं मुसलमान मुसलमान एक अल्लाह के बंदे हैं हिन्दुओं, ईसाइयों, पारसियों का क्या? आप जो खोजने चलें हैं आप शुरू में ही उससे इंकार कर देते हैं, क्यांेकि आप अपने विश्वासों से बंधे हुए हैं, विश्वासों की सूली पर टंगे हुए हैं क्योंकि आप मानते हैं कि विश्वास सीमाओं को ढहाने वाला सशक्त जरिया है चाहे वो कहीं भी हो आप उसी पर जोर देते हैं। यही बातें सब तरफ देखी जा रही हैं।
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धर्म, जैसा की हम सामान्य तौर पर जानते हैं या मानते हैं, मतों - मान्यताओं, रीति रिवाजों परंपराओं, अंधविश्वासों, आदर्शों के पूजन की एक श्रंखला है। आपको आपके हिसाब से तय अंतिम सत्य को ले जाने के लिए मार्गदर्शक गुरूओं के आकर्षण। अंतिम सत्य आपका प्रक्षेपण है, जो कि आप चाहते हैं, जो आपको खुश करता है, जो आपको मृत्यु रहित अवस्था की निश्चितता देता है। तो इन सभी में जकड़ा मन एक धर्म को जन्म देता है, मत-सिद्धांतों का धर्म, पुजारियों द्वारा बनाया गया धर्म, अंधविश्वासों और आदर्शों की पूजा। इन सबमें मन जकड़ जाता है, दिमाग जड़ हो जाता है। क्या यही धर्म है? क्या धर्म केवल विश्वासों की बात है, क्या अन्य लोगों के अनुभवों, ज्ञान, निश्चयों का संग्रह धर्म है? या धर्म केवल नैतिकता भलमनसाहत का अनुसरण करना है? आप जानते हैं कि नैतिकता भलमनसाहत, आचरण से तुलनात्मक रूप से सरल है। आचरण में करना आ जाता है ये करें या न करें, चालाकी आ जाती है। क्योंकि आचरण सरल है इसलिए आप आसानी से एक आचरण पद्धति का अनुसरण कर सकते हैं। नैतिकता के पीछे घात लगाये बैठा स्वार्थ अहं पुष्ट होता रहता है, बढ़ता रहता है, खूंखार रूप से दमन करता हुआ, अपना विस्तार करता रहता है। तो क्या यह धर्म है।

आपको ही खोजना होगा कि सत्य क्या है क्योंकि यही बात है जो महत्व की है। आप अमीर हैं या गरीब, आप खुशहाल वैवाहिक जीवन बिता रहें हैं और आपके बच्चे हैं, ये सब बातें अपने अंजाम पर पहुंचती है, जहां हमेशा मृत्यु हैं। तो विश्वास, अपने मत के किसी भी रूप, पूर्वाग्रह रहित होकर आपको सत्य को जानना होगा। आपको खुद अपने लिए ओज और तेज सहित, खुद पर अवलम्बित हो पहल करनी होगी कि सत्य क्या है?, भगवान क्या है?। मत और आपका विश्वास आपको कुछ नहीं देगा, विश्वास केवल भ्रष्ट करता है, जकड़ता है, अंधेरे में ले जाता है। खुद ही ओज और तेज सहित उठ पहल करने पर ही आत्मनिर्भर, मुक्त हुआ जा सकता है।
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क्या आप जानते हैं धर्म क्या है? जप तप में, पूजा में या ऐसे ही अन्य रीति-रिवाजों में धर्म नहीं। यह धातु या पत्थर की मूर्तियों की पूजा में भी नहीं, न ही मंदिरों या मस्जिदों या चर्चों में है। यह बाइबिल या गीता पढ़ने या दिव्य/पवित्र कहे जाने वाले नामों को तकिया कलाम बना लेने में भी नहीं है, यह आदमी के अन्य अंधविश्वासों में भी नहीं है। ये सब धर्म नहीं।

धर्म अच्छाई, भलाई, शुभता का अहसास है। प्रेम है जो जीती जागती, भागती दौड़ती नदी की तरह अनन्त सा बह रहा है। इस अवस्था में आप पातें हैं कि एक क्षण ऐसा है जब कोई किसी तरह की खोज बाकी नहीं रही; और खोज का अन्त ही किसी पूर्णतः समग्रतः भिन्न का आरंभ है। ईश्वर, सत्य की खोज, पूरी तरह अच्छा बनना, दयालु बनने की कोशिश, धर्म नहीं। मन की ढंपी-छुपी कूट चालाकियों से परे - किसी संभावना का अहसास, उस अहसास में जीना, वही हो जाना यह असली धर्म है। पर यही तभी संभव है जब आप उस गड्ढे को पूर दें जिसमें आपका ‘अपनापन, अहंकार, आपका ‘कुछ’ भी होना रहता है। इस गड्ढे से बाहर निकल जिंदगी की नदी में उतर जाना धर्म है। जहां जीवन का आपको संभाल लेने का अपना ही विस्मयकारी अंदाज है, क्योंकि आपकी ओर से, आपके मन की ओर से कोई सुरक्षा या संभाल नहीं रही। जीवन जहां चाहे आपको ले चलता है क्योंकि आप उसका खुद का हिस्सा हैं। तब ही सुरक्षा की समस्या का अंत हो जाता है इस बात का भी कि लोग क्या कहेंगे, क्या नहीं कहेंगे और यह जीवन की खूबसूरती है।
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आपका विश्वास, ईश्वर नहीं है

एक आदमी जो ईश्वर में विश्वास करता है ईश्वर को नहीं खोज सकता। ईश्वर एक अज्ञात अस्तित्व है, और इतना अज्ञात कि हम ये भी नहीं कह सकते कि उसका अस्तित्व है। यदि आप वाकई किसी चीज को जानते हैं, वास्तविकता के प्रति खुलापन रखते हैं तो उस पर विश्वास नहीं करते, जानना ही काफी है। यदि आप अज्ञात के प्रति खुले हैं तो उसमें विश्वास जैसा कुछ होना अनावश्यक है। विश्वास, आत्म प्रक्षेपण का एक ही एक रूप होता है, और केवल क्षुद्र मन वाले लोग ही ईश्वर में विश्वास करते हैं। आप अपने हीरो लड़ाकू विमान उड़ाने वालों का विश्वास देखिये, जब वो बम गिरा रहे होते हैं तो कहते हैं कि ईश्वर उनके साथ है। तो आप ईश्वर में विश्वास करते हैं जब लोगों पर बम गिरा रहे होते हैं, लोगों का शोषण कर रहे होते हैं। आप ईश्वर में विश्वास करते हैं और जी-तोड़ कोशिश करते हैं कि कहीं से भी किसी भी तरह से अनाप शनाप पैसा आ जाये। आपने भ्रष्टाचार, लूट खसोट से कोहराम मचा रखा है। आप अपने देश की सेना पर अरबों-खरबों रूपये खर्च करते हैं और फिर आप कहते हैं कि आप में दया, सद्भाव है, दयालुता है, आप अहिंसा के पुजारी हैं। तो जब तक विश्वास है, अज्ञात के लिए कोई स्थान नहीं। वैसे भी आप अज्ञात के बारे में सोच नहीं सकते, क्योंकि अज्ञात तक विचारों की पहुंच नहीं होती। आपका मन अतीत से जन्मा है, वो कल का परिणाम है - क्या ऐसा बासा मन अज्ञात के प्रति खुला हो सकता है। आपका मन, बासेपन का ही पर्याय है - बासापन ही है। यह केवल एक छवि प्रक्षेपित कर सकता है, लेकिन प्रक्षेपण कभी भी यथार्थ वास्तविकता नहीं होता। इसलिए विश्वास करने वालों का ईश्वर वास्तविक ईश्वर नहीं है बल्कि ये उनके अपने मन का प्रक्षेपण है। उनके मन द्वारा स्वान्तःसुखाय गढ़ी गई एक छवि है, रचना है। यहां वास्तविकता यथार्थ को जानना समझना तभी हो सकता है जब मन खुद की गतिविधियों प्रक्रियाओं के बारे में समझ कर, एक अंत समाप्ति पर आ पहुंचे। जब मन पूर्णतः खाली हो जाता है तभी वह अज्ञात को ग्रहण करने योग्य हो पाता है। मन तब तक खाली नहीं हो सकता जब तक वो संबंधों की सामग्री सबंधों के संजाल को नहीं समझता। जब तक वह धन संपत्ति और लोगों से संबंधों की खुद की प्रकृति नहीं समझ लेता और सारे संसार से यथार्थ वास्तविक संबंध नहीं स्थापित कर लेता। जब तक वो संबंधों की संपूर्ण प्रक्रिया, संबंधों में द्वंद्वात्मकता, रिश्तों के पचड़े नहीं समझ लेता मन मुक्त नहीं हो सकता। केवल तब, जब मन पूर्णतः निस्तब्ध शांत पूर्णतया निष्क्रिय निरूद्यम होता है, प्रक्षेपण करना छोड़ देता है, जब वह कुछ भी खोज नहीं रहा होता और बिल्कुल अचल ठहरा होता है तभी वह पूर्ण आंतरिक और कालातीत अस्तित्व में आता है।
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ध्यान

ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना है।

एक निःश्छल, निस्वार्थ दिल का होना ध्यान का आरंभ है। जब हम उस के बारे में बात करना चाहते हैं तो मन मस्तिष्क के अंतस्तल की कोशिशों की आवश्यकता होगी। हमें पहला कदम उसके सबसे निकट के बिंदु से उठाना होगा। ध्यान का फल है शुभता और निश्छल ह्दय ध्यान का आरंभ है। हम जीवन की बहुत सी चीजों के बारे में बात करते हैं। प्रभुता, महत्वाकांक्षा, भय, लोभ, ईष्र्या, मृत्यु के संबंध में बहुत सी बातें करते हैं। अगर आप देखें तो, अगर आप इनके भीतर तक जाएं तो, यदि आप ध्यानपूर्वक सुने तो ये सारी बातें एक ऐसे मन को खड़ा करने का आधार हैं जो ध्यान में सक्षम हो। आप ध्यान के शब्द से खेल सकते हैं - ध्यान नहीं कर सकते यदि आप महत्वाकांक्षी हों। यदि आपका मन प्रभुत्व का आकांक्षी है, संस्कारों में बंधा है, स्वीकार और अनुसरण में लगा है तो आप ध्यान की खूबसूरती का अतिरेक नहीं देख सकतेे।
समयबद्ध रूप से इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिशें, मन की निश्छलता को, निस्वार्थ भाव को खत्म करती हैं। और आपको चाहिए एक निश्छल मन - एक खुला ह्दय, जो आकाश की तरह खाली हो। एक दिल जो बिना विचारे, निरूद्देश्य देना चाहता हो बिना किसी प्रतिफल की आशा के। क्षुद्रतम से लेकर जितना भी उसके पास हो उसे देने की त्वरितता, बिना किसी असमंजस, भले बुरे की परवाह बगैर, मानरहित..... किसी ऊंचाईयां की तलाश की कोशिश बगैर, बिना प्रसिद्धि की लालसा में। ऐसे उर्वर मन की भूमि पर ही शुभता फूलती फलती है। और ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।
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ध्यान, जीवन की महानतम कला है और इसका सौन्दर्य इसमें भी है कि इसे किसी अन्य से सीखना संभव नहीं। इसकी कोई तकनीक नहीं और इसलिए इस पर कोई आधिपत्य भी नहीं।
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क्या सत्य कुछ निर्णायक, चरम और स्थिर-सी जड़ चीज है? या हम चाहते हैं कि सत्य कुछ निर्णायक सी, चरम और स्थिर-जड़-सी चीज हो ताकि हमें उसके नीचे आसरा मिल सके। हम चाहते हैं कि वो चिरस्थायी हो ताकि हम उसे पकड़ सकें, उसमें खुशियां ढूंढ सकें। पर क्या सत्य पूरी तरह, निरंतर, कितनी बार भी अनुभव किये जाने पर भी वैसा का वैसा रहने वाली चीज है? अनुभवों का दोहराव, स्मृतियों का संचयन है, ऐसा नहीं है क्या? मौन के क्षणों में, मैं एक सत्य अनुभव करता हूं, पर यदि मैं इसे स्मृति और अनुभव के रूप में पूर्ण और निरपेक्ष स्थिर कर दूं तो क्या वह सत्य रहेगा? क्या सत्य सततता है, स्मृति की उपज है? या सत्य केवल तब मिलता है जब मन नितांत स्थिर होता है? जब मन स्मृतियों की जकड़ से परे होता है, स्मृतियों की उपज के रूप में पहचान का कोई केन्द्र नहीं होता, पर सब कुछ के प्रति एक होश या चेतना भर होती है। जो मैं कह रहा हूं, जो कुछ भी अपने संबंधों में मैं कर रहा हूं, मेरी गतिविधियों में, सब कुछ के सत्य को प्रतिक्षण देखते हुए, जैसा वो है - निश्चित ही यही ध्यान का ढंग है, क्या नहीं? जब मन ठहरा हुआ हो तब एक बोध मात्र होता है। यह बोध मात्र मन का ठहराव तब तक नहीं होता जब तक खुद से बेपरवाही... एक उन्मनापन नहीं होता। और यह उन्मनापन किसी भी प्रकार के अनुशासन, किसी भी संप्रभुता के अनुशीलन वो प्राचीन हो या आधुनिक से उपलब्ध नहीं होता। विश्वास प्रतिरोध, अलगाव पैदा करता है और जहां अलगाव हो वहां प्रशांतधीरता की संभावना नहीं रहती। यह धीरता स्वयं को पूर्ण रूप से समझने, अपने ‘मैं’ जो कि कई द्वंद्वों के अस्तित्व से मिलकर खड़ा हुआ है को समझने के बाद ही आती है। यह एक कठिन कार्य है तो हम कई अन्य जुगाड़ों करामातों की ओर मुड़ जाते हैं जिन्हें हम ध्यान का नाम देते हैं। मन की यह चालाकियां ध्यान नहीं हैं। ध्यान आत्मज्ञान का आरंभ है और ध्यान के बिना कोई आत्मज्ञान नहीं।

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