15 Sep 2009

हम वैचारिकता की पूजा करते हैं। जितना ज्यादा और तीव्रता से हम सोचते हैं उतने ही बड़े माने जाते हैं। सभी दार्शनिकों ने असंख्य संकल्पनाएं दी हैं। पर यदि हम अपने ही भ्रम का निरीक्षण करें, अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में संकीर्ण ढंग से देखने के रवैये को देखें, घर पर रोजमर्रा की दिनचर्या में देखें। इन सब के प्रति जागरूक रहें तो देखें कि कैसे विचार अविरत समस्याएं बनाने में ही लगा रहता है। विचार छवि बनाता है और छवि बाँटती है। यह देखना बुद्धिमत्ता है। खतरे को खतरे की तरह देखना बुद्धिमत्ता है। मनोवैज्ञानिक खतरों को देखना बुद्धिमत्ता है। पर प्रकतया हम इन चीजों को नहीं देखते।
इसका मतलब ये है कि कोई आपको हमेशा हांकता रहे, कारण बताकर उपदेश देता रहे, धकेलता रहे, संचालित करता रहे या कहता रहे, अनुनय करे कि कुछ करो तो ठीक वरना आप अन्य सारे समय अपने आप जागरूक रहने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं। आप चाहते हैं कि एक आदमी हमेशा आपको जागरूक रखने के लिये, यह सब करने के लिए आपके साथ साथ हमेशा रहे। बताये कि ये करना ये ये नहीं, यहां जाना है यहां नहीं। और ऐसा कोई भी नहीं करेगा, यहां तक कि अति जागरूक व्यक्ति, बुद्धपुरूष भी नहीं। क्योंकि यदि कोई जागरूक बुद्धपुरूष आपक पीछे इस तरह पड़ भी जाये तो आप केवल उसके दास या गुलाम की तरह हो जाएंगे, आप समझ रहे हैं न।

तो यदि किसी को पास जिन्दादिली है, शारीरिक उर्वरता है, मनोवैज्ञानिक ऊर्जा है, जो कि अभी आपके आंतरिक द्वंद्वों, चिंता, बकवास चेटिंग, अनन्त गपबाजी में व्यर्थ ही खर्च कर रहे हैं.... आप अपनी ही नहीं अन्य लोगों की शक्ति भी व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं, यही जिन्दादिली, शारीरिक और मानसिक शक्ति अथवा ऊर्जा आत्म अवधान में लगाई जा सकती है, वहां यह अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

यही वह ऊर्जा है जिसका आप सबंधों के दर्पण में अपने आपको देखने पहचानने के लिए निवेश कर सकते हैं। हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हीं सम्बंधों में हमें संभ्रमों, गढ़ी हुई छवियों, व्यर्थताओं, ओढ़े हुए सिद्धांतों को देख पहचान कर इनसे बाहर निकलना है। इनसे निवृत्ति ही हमें मुक्ति के आकाश में ले जाएगी जहां सच्ची बुद्धिमत्ता प्रकट होती है, जो हमें जीवन का सही रास्ता दिखाती है। तो चलिये इसी मुक्ति की राह पर हम साथ साथ चलें।
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