26 Nov 2010

जे कृष्णमूर्ति जी की शिक्षाओं का निचोड़

जे कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं का निचोड़ उनके सन 1929 में दिये गये वक्तव्य में है जिसमें उन्होंने कहा-

सच एक पथरहित भूमि है यानि सच ऐसा गंतव्य है जहां तक कि सुनिश्चित, बंधे बंधाये मार्ग से नहीं पहुंचा जा सकता। इंसान को यदि सच तक पहुंचना है तो वो ऐसा किसी संगठन, किसी पंथ, किसी परंपरा या रूढ़ि, संत-महात्मा-पंडे-पुजारी या रीति रिवाजों के अनुसरण से नहीं पहुंच सकता। ना ही किसी दार्शनिक ज्ञान या मनोवैज्ञानिक तकनीक से ही सच तक पहुंच संभव है। यदि किसी को सच का पता लगाना है तो उसे खुद को संबंधों के दर्पण में देखना होगा, अपने मन के तत्वों को समझना होगा, अवलोकन करना होगा ना कि बौद्धिक विश्लेषण या आत्मविश्लेषण, खयाली चीरफाड़ से यह संभव हो सकेगा। इंसान ने अपनी सुरक्षा की बाड़ के रूप में, अपनी ही धार्मिक, राजनीतिक, वैयक्तिक आदि कई छवियां बना रखी हैं। इंसान के व्यवहार में ये प्रतीकों, विचारों और विश्वासों के रूप में प्रकट होती हैं। इन गढ़ी हुई छवियों का बोझ - इंसान की सोच, उसके रिश्ते और उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी पर हावी रहता है। एक दूसरे के बारे में गढ़ी हुई ये छवियां ही इंसानी समस्याओं का कारण हैं क्योंकि ये एक आदमी को दूसरे से अलग करती हैं, दो व्यक्तियों में अलगाव बनाती हैं। इंसान के मन में पहले से ही स्थापित धारणाओं के आधार पर जीवन के प्रति उसका नजरिया आकार लेता है। जो आदमी की चेतना में है वही उसका पूरा अस्तित्व होता है। किसी व्यक्ति का नाम, पंरपरा और परिवेश से ग्रहण बातें ही उसकी सतही सांस्कृतिक और निजता की पहचान बनते हैं। लेकिन आदमी का अनूठापन उसकी बाहरी छद्म पहचान में नहीं, अपितु अपनी चेतना की सभी तत्वों से पूरी तरह मुक्त हो रहने में निहित है, जो सारी मानवता के लिए एकसमान रूप से लागू होता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति का सारी मानवता से अलग, किसी प्रकार का अस्तित्व नहीं है।

मुक्ति कोई प्रतिक्रिया नहीं है - ना ही कोई चुनाव या पसंद है। यह आदमी का ही दिखावा है कि - क्योंकि वह चुन रहा है, इसलिए वह मुक्त है। मुक्ति विशुद्ध अवलोकन है - बिना किसी दिशा या कारण के, बिना किसी सजा या दंड के भय या ईनाम के। मुक्ति का कोई निहितार्थ या उद्देश्य भी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि जब किसी मनुष्य का पूरा विकास हो जाता है तो, मनुष्यत्व का चरम आ जाता है तब वो मुक्त हो जाता है पर उसके अस्तित्व के पहले कदम पर ही मुक्ति भी निहित है.. मुक्ति भी होती ही है। अवलोकन में/से ही कोई देखना शुरू करता है कि कहां कहां मुक्ति का अभाव है, कमी है, कहां मुक्ति नहीं है... वो बंध रहा है। मुक्ति हमारे दैनिक जीवन, उसकी गतिविधियों को बिना पसंद-नापसंद के या चयनरहित होकर देखने या अवधान.., ध्यान में रहने में पाई जाती है।

विचार समय है। विचार, अनुभव और ज्ञान से जन्मता है। अनुभव और ज्ञान समय और अतीत से अलग नहीं किये जा सकते। समय, इंसान का मनौवैज्ञानिक दुश्मन है। हमारे कर्म ज्ञान पर आधारित होते हैं, यानि समय पर आधारित होते हैं इसलिए इंसान हमेशा ही अतीत का दास या गुलाम होता है। विचार हमेशा सीमित होता है, उसकी सीमाएं होती हैं इसलिए हम अनवरत, नित्य ही द्वंद्व और संघर्ष में जीते हैं। मनोवैज्ञानिक विकास नाम की कोई चीज नहीं होती। जब आदमी अपने ही विचारों की गतिविधियों के प्रति जाग जाता है, अवधान-ध्यानपूर्ण हो जाता है तो वह देख पाता है कि विचारक और विचार के बीच में क्या कोई अंतर है भी,। वह देख पाता है कि अवलोकनकर्ता और अवलोकन, अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच क्या कोई अंतर है भी। वह जान जाता है कि इनके बीच अंतर, एक भ्रम है। तब वहां केवल विशुद्ध अवलोकन रह जाता है, जो कि वो अंर्तदृष्टि है जो अतीत की किसी भी तरह की छाया से रहित होती है। यह समयातीत अंतदृष्टि मन में गहरा, अत्यंतिक मूल बदलाव लाती है।

पूरी तरह नकार, पूर्ण निषेध ही सकार का निचोड़ है। जब उन सभी चीजों का निषेध या नकार हो जाता है जिन्हें कि विचार द्वारा मनौवैज्ञानिक रूप से पैदा किया जाता है -तब जो शेष रहता है - वह ही प्रेम है, जो परम संवेदना या करूणा भी है, जो परम प्रज्ञा या समझ भी है।

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