2 Mar 2010

वि‍चार का अन्‍त - ध्‍यान है

मन और मस्तिष्क की गुणवत्ता, ध्यान में महत्वपूर्ण है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आपने क्या उपलब्ध किया या उपलब्धि के बारे में आप क्या कह रहे हैं, बल्कि मन का वह गुण है जो निर्दोष और अतिसंवेदनशील है। नकार के द्वारा सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है। हम समूह में रहें या अपने में, अनुभव के द्वारा, ध्यान की शुद्धता को नकारते हैं। किसी अन्त पर पहुंचना ध्यान का ध्येय नहीं है। यह ध्येय भी है और साथ ही उसकी समाप्ति भी। अनुभव के द्वारा मन को कदापि निर्दोष या शुद्ध नहीं बनाया जा सकता। अनुभव को नकारने पर ही निर्दोषता की सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है जो कि विचार द्वारा नहीं गढ़ी जा सकती। विचार कभी भी निर्दोष नहीं होता। ध्यान विचार की समाप्ति है, पर ध्यान करने वाले के द्वारा नहीं, ध्यान करने वाले के लिए ध्यान है। यदि ध्यान नहीं है तो प्रकाश और रंगों के अति सुन्दर विश्व में जैसे आप एक अंधे आदमी की तरह हैं। आप कभी सागर किनारे भटकें तो ध्यान के ये गुण आपके पास आते हैं। यदि कभी ऐसा होता है तो उनका पीछा ना करें। यदि आप उनका अनुसरण करते हैं तो यह आपकी स्मृति का सक्रिय होना है जो अतीत होता है और ....जो है उसकी मृत्यु अतीत है। या जब आप जंगलों पहाड़ों में विचरण कर रहे हों तो अपने आस-पास के सम्पूर्ण वातावरण को, सब कुछ को जीवन के सौन्दर्य और पीड़ाओं को आपसे कहने दें ताकि आप भी अपने दुख के प्रति जागरूक हो सकें और ये दुख खत्म हो सकें।
ध्यान जड़ है, ध्यान पौधा है। ध्यान फूल है और ध्यान फल है। यह शब्द ही हैं जो फल, फूल, पौधे और जड़ को अलग अलग कर देते या बांट देते हैं। इस बंटवारे में कोई भी कर्म भलेपन तक नहीं पहुंचता और सद्गुण या भलाई सम्पूर्ण दृष्टि से ही जन्मते हैं।


Meditation in the ending of thought

What is important in meditation is the quality of the mind and the heart. It is not what you achieve, or what you say you attain, but rather the quality of a mind that is innocent and vulnerable. Through negation there is the positive state. Merely to gather, or to live in, experience, denies the purity of meditation. Meditation is not a means to an end. It is both the means and the end. The mind can never be made innocent through experience. It is the negation of experience that brings about that positive state of innocency which cannot be cultivated by thought. Thought is never innocent. Meditation is the ending of thought, not by the meditator, for the meditator is the meditation. If there is no meditation, then you are like a blind man in a world of great beauty, light and colour. Wander by the seashore and let this meditative quality come upon you. If it does, don't pursue it. What you pursue will be the memory of what it was - and what was is the death of what is. Or when you wander among the hills, let everything tell you the beauty and the pain of life, so that you awaken to your own sorrow and to the ending of it. Meditation is the root, the plant, the flower and the fruit. It is words that divide the fruit, the flower, the plant and the root. In this separation action does not bring about goodness: virtue is the total perception.
The Second Penguin Krishnamurti Reader Talks in Europe 1968
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