1 Jan 2010

सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है



जबकि सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है तो आप किसी अन्य आदमी का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? अपने आप का अध्ययन करें, आप ही सारी मानवता हैं, वृहत दूरूहपन द्वंद्वात्मकता, अत्यंतिक संवेदना आप ही हैं। आप इस बात का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं कि कोई अन्य आदमी के बारे में क्या कहता है। और आप ही तो हैं जो अन्य आदमी से संबंधित हैं, यही तो समाज है। आपने ही तो यह भयावह, कुरूप दुनिया गढ़ी है जो अब पूरी तरह अर्थहीन होती जा रही है, यही तो वजह है कि दुनियां भर के युवा विद्रोही हो रहे हैं। मेरे लिये यह एक अर्थहीन जीवन है। आदमी ने जो यह दुनियां गढ़ी है उसकी अपनी ही मांगों का निक्षेप या फल है, उसकी अपनी ”तुरन्त चाहिये” तात्कालिक प्राथमिकताओं, आदतों, महत्वाकांक्षाओं, लाभ और ईष्र्या का निचोड़ है। आप सोचते हैं कि आप मानव के संबंध में सभी पुस्तकों का अध्ययन कर लेंगे और समाज में जाएंगें तो आप अपने आपको समझ सकेंगे। लेकिन क्या यह ज्यादा सरल और सहज नहीं है कि आप अपने से ही शुरूआत करें?


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