16 Feb 2011

हम सच का सामना क्यों नहीं करना चाहते?


क्यों कल्पनाएं और सिद्धांत हमारे दिमाग में जड़ें बना लेते हैं? क्यों हमारे लिए तथ्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण नहीं हो जाते बजाय संकल्पनाओं के, सिद्धांतों के? क्यों संकल्पनात्मक/सैद्धांतिक पक्ष तथ्यों की अपेक्षा इतना महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या हम तथ्य को नहीं समझ पाते, या हम में इसकी सामथ्र्य ही नहीं है, या, हम तथ्य का , सच का सामना करने से डरते हैं? इसलिए आईडियाज, विचार, संकल्पनाएं, अनुमान तथ्य से पलायन का एक जरिया बन जाते हैं। आप लाख भागें, आप सभी तरह की ऊटपटांग बातें कर लें पर तथ्य यह है कि हमीं लोगों में से कई महत्वाकांक्षी है, कई कामवासना में धंसे हुए हैं, तथ्य यह है कि हमीं में से कई क्रोधी हैं और इसी तरह के दर्जनों तथ्य। आप इन सब का दमन कर सकते हैं, आप इनकी दिशा बदल इनको चुप करा देते हैं, जो दमन का ही एक अन्य प्रकार है, आप इन पर नियंत्रण भी पा लेते हैं, लेकिन ये सब दमन, नियंत्रित करना, अनुशासन में आ जाना संकल्पनाओं द्वारा होता है। क्या सिद्धांत संकल्पनाएं, मत, वाद हमारी ऊर्जा को नष्ट नहीं करते? क्या विचार हमारे मन मस्तिष्क को कुंद नहीं बनाते। आप अनुमान लगाने, दूसरों को उद्धृत करने में कुशल हो सकते हैं लेकिन एक जड़ मन ही दूसरों को उद्धृत करता है ...
यदि आप विपरीत का द्वंद्व एकबारगी ही खत्म कर दें और तथ्य के साथ जीने लगें तो आप अपने अन्दर उस ऊर्जा को मुक्त कर देंगे जो तथ्य का बखूबी सामना कर लेती है। हममें में से बहुत से लोगों के लिए विरोधाभासों का ऐसी विशेष परिधि होती है जो हमारे मनमस्तिष्क को जकड़े रखती है। हम करना कुछ चाहते हैं, और कर कुछ और ही रहे होते हैं। लेकिन यदि हम उस तथ्य का सामना करें जो हम करना चाहते हैं तो विरोधाभास नहीं रहेगा। इसलिए यदि मैं एकबार में ही विरोधाभास के संपूर्ण भाव को खत्म कर दूं तो मैं मन पूरी तरह उस तथ्य की समझ से वास्ता रखेगा ”जो मैं हूं“, जो तथ्य है।

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