11 Jan 2010

झूठ के सच को देखना



अनुभव की भूख या तृष्णा ही भ्रम का, माया का आरंभ है। जैसा कि अब आप जानते हैं, आपकी दृष्टि- आपकी पृष्ठभूमि या अतीत का प्रेक्षण या अनुमान है, या परिस्थितियों द्वारा संभावनाओं को देखना है, और यह ही वह अनुमान या संभावनाएं हें जो आपने अनुभव किये हैं। निश्चित ही यह ध्यान नहीं हैं। ध्यान का आरंभ वहां से होता है जब आप अपनी पृष्ठभूमि , अपने आपको समझना शुरू करते हैं। बिना अपनी पृष्ठभूमि को, बिना अपने आप को समझे आप जिसे ध्यान कहते हैं वो चाहे कितना ही आनंददायक या दुखदायक हो वो आत्म सम्मोहन है। आप आत्मनियंत्रण का अभ्यास करते हैं, विचारों में महारत हासिल करते हैं और अनुभवों में आगे बढ़ने के लिए ध्यान केन्द्रित करते हैं। यह आत्म स्व केन्द्रित धंधा है, यह ध्यान नहीं है और यह देखना जानना कि क्या ध्यान नहीं है यह ही ध्यान का आरंभ है। झूठ के सच को देख लेने पर ही मन असत्य से मुक्त होता है। झूठ से मुक्त होने की आकांक्षा से ही झूठ से आजादी नहीं मिल जाती, यह मुक्ति तब आती है जब हमें किसी सफलता, किसी निर्णय, परिणाम या अंत को उपलब्ध हो जाने से सरोकर नहीं होता। सारी खोजों पर विराम होने पर ही वह संभावना होती है... कि वो अस्तित्व में आये जो अनाम है।

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