15 Dec 2009

प्रेम भावुकता नहीं है।



स्पष्टतः प्रेम भावुकता नहीं है। कपोल कल्पनाओं में होना या भावुक हो जाना प्रेम नहीं है क्योंकि ख्यालीपन और भावुकता ये संवेदनाएं, अनुभूतियाँ उत्तेजनाएं मात्र हैं। एक धार्मिक व्यक्ति जो ईसामसीह या कृष्ण का नाम लेकर रो रहा हो या अपने गुरू का या किसी अन्य का वो केवल कल्पनाओं में में बह रहा या भावुक मात्र है, वह उत्तेजनाओं में मग्न है। संवेदना या उत्तेजना विचार की प्रक्रिया है और विचार प्रेम नहीं है। विचार संवेदना का परिणाम है, तो वो जो भावुक व्यक्ति है, जो भावनाओं में बह रहा है प्रेम नहीं जान सकता। क्या हम ख्यालों और भावुकता से भरे नहीं हैं? ख्यालों, भावों में बह जाना आत्म अहं विस्तार का ही एक रूप है। जो ख्यालों में ही रह रहा हो वो स्पष्टतः प्रेम में नहीं हो सकता क्योंकि यदि एक ख्याली व्यक्ति की कल्पनाओं को प्रत्युत्तर नहीं मिलता तो बहुत ही क्रूर व्यक्ति हो सकता है। यदि उसकी कल्पनाओं को को बह निकलने की जगह नहीं मिलती तो वह बहुत ही क्रूर हो सकता है। एक भावुक व्यक्ति को नफरत, युद्ध और नरसंहार के लिए भड़काया उकसाया जा सकता है। एक व्यक्ति जो अपने नाजुकख्यालों में बह रहा है, अपने धर्म के लिए आंसुओं से भरा हुआ है, निश्चित ही उसके पास प्रेम नहीं होता।

Love is not sentiment

Obviously love is not sentiment. To be sentimental, to be emotional, is not love, because sentimentality and emotion are mere sensations. A religious person who weeps about Jesus or Krishna, about his guru and somebody else is merely sentimental, emotional. He is indulging in sensation, which is a process of thought, and thought is not love. Thought is the result of sensation, so the person who is sentimental, who is emotional, cannot possibly know love. Again, aren’t we emotional and sentimental? Sentimentality, emotionalism, is merely a form of self-expansion. To be full of emotion is obviously not love, because a sentimental person can be cruel when his sentiments are not responded to, when his feelings have no outlet. An emotional person can be stirred to hatred, to war, to butchery. A man who is sentimental, full of tears for his religion, surely, has no love.
The First and Last Freedom, pp 232-233



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