23 Jun 2011

जीवन की आम समस्‍याओं में गहरी पैठ ही जीवन की सत्‍यों से परि‍चि‍त कराती है


प्रश्‍़न * मेरे जैसा आम आदमी ज्यादातर अपनी तात्कालिक समस्याओं जैसे अभाव, बेरोजगारी, बीमारी, द्वंद्व आदि में ही घिरा रहता है। तो जीवन की गहरे मुद्दों की ओर मैं कैसे ध्यान दे सकता हूं? हम सभी लोग आपदाओं से तात्कालिक राहत पाने के उपाय ढूंढते रहते हैं।

उत्‍तर हम सभी अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान चाहते हैं। हम सभी आमजन हैं, भले ही हम सामाजिक या धार्मिक रूप से कितने ही उच्च पद पर आसीन हों। हमारी रोजाना की आम जिन्दगी में यही छोटी-छोटी परेशानियां रहती हैं - जलन, गुस्सा, हमें कोई प्यार नहीं करता- इस बात का दुख और अगर प्यार किया जा रहा है तो उसका अपार आनन्द... यदि आप जीवन की इन छोटी-छोटी चीजों को समझ सकें, तो आप इनमें अपने दिलदिमाग के काम करने के ढंग को देख सकेंगें। यह मुद्दा नहीं है कि आप गृहिणी हैं और आपको आजीवन दिन में तीन बार खाना बनाना है, पति की दासता में रहना या पति हैं तो पत्नी की गुलामी करनी है।
खुशी, गम, विपत्तियों, आशा, निराशा के इन संबंधों को यदि आप बहुत ही सतही स्तर से शुरू करें तो यदि आप इनका अवलोकन करते हैं, देखते हैं, धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करते हुए, बिना बढ़ाई या निंदा करते हुए, सचेत रहते हुए, बिना कोई फैसला किये तो आपको मन समस्या में गहरे और गहरे पैठता जाता है। लेकिन यदि आप किसी समस्या विशेष से निजात पाने के पहलू से ही सरोकार रखते हैं तो आपका मन बहुत ही सतही स्तर पर बना रहता है।
ईष्र्या या जलन की समस्या को ही लंे क्योंकि हमारा समाज ईष्र्या पर ही आधारित है। ईष्र्या है अर्जित करना, लोभ। आपके पास कुछ है; मेरे पास नहीं है, आप कुछ हैं; मैं कुछ भी नहीं हूं और मैं कुछ होने के लिए आपसे प्रतिस्पर्धा करता हूं। आपके पास अधिक ज्ञान है, अधिक धनदौलत है, अधिक अनुभव है, मेरे पास नहीं है तो इस प्रकार यह चिरस्थायी संघर्ष बना रहता है। आप हमेशा आगे ही आगे बढ़ते चले जाते हैं और मैं हमेशा नीचे की ओर धंसता, गिरता चला जाता हूं। आप गुरू हैं और मैं शिष्य हूं या अनुयायी हूं... और आपके और मेरे बीच गहरी खाई है आप हमेशा आगे हैं और मैं हमेशा पीछे। यदि हम देख सकें,  तो इस सभी संघर्षों के, इन सभी कोशिशों के, इन सभी दुखपीड़ाओं के, इन छोटी मोटी बीमारियों के और रोजाना की अन्य कई छोटी छोटी बातांे के असंख्य निहितार्थ हैं।
आपको वेद पुराणों, किताबों को पढ़ने की कतई आवश्यकता नहीं है, आप इन सबको एक तरफ रख दें, इनका कोई महत्व नहीं हैं, महत्वपूर्ण यह बात है कि आप अपने जीवन की इन छोटी-छोटी बातों को उनकी वास्तविकता में देखें उनसे सीधे-सीधे साक्षात्कार करें तो यही चीजें आपको अपने अन्र्तनिहित तथ्यों से भिन्न रूप से साक्षात्कार करायेंगी।
आखिरकार, जब आप किसी वृक्ष का सौन्दर्य देखते हैं, उड़ती हुई चिडि़या देखते हैं, सूर्यास्त या लहराता हुआ जल देखते हैं तो ये सब आपको बहुत कुछ बताते हैं, और जब आप जीवन की कुरूप चीजें देखें - धूल, गंदगी, निराशा, अत्याचार, भय को... तो ये सब भी विचार की मूलभूत प्रक्रिया से परिचित कराते हैं। यदि मन केवल पलायन से ही सरोकार रखता है, किसी रामबाण उपाय की तलाश में रहता है, सभी सम्बंधों के अन्वेषण से बचना चाहता है तो हम इन सब के प्रति कदापि सचेत नहीं हो सकते। दुर्भाग्य से हमारे पास धैर्य नहीं है, हम त्वरित जवाब चाहते है... समाधान चाहते हैं, हमारा मन समस्या के प्रति बहुत ही बेसब्रा है..अधैर्यपूर्ण है।
लेकिन यदि मन समस्या का अवलोकन करने में सक्षम हो सके, उससे दूर ना भागे, उसके साथ जी सके - तब यही समस्या उसके सामने अपने सारे अद्भुत गुणधर्मों को खोलती चली जायेगी।  मन समस्या की गहराई तक जा सकेगा, तो मन कोई ऐसी चीज नहीं रह जायेगा जो परिस्थितियों, समस्याओं, विपत्तियों द्वारा परेशान हो जाये। तब मन जल से आपूरित एक शांत स्निग्ध ताल की तरह हो जायेगा और केवल ऐसा ही मन निश्चलता और शांति में सक्षम हो सकता है।

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