22 Aug 2009

कोई बाहरी अस्तित्व नहीं जो इसको गायब कर दे।

बहुत ही सीधे ढंग से कहें तो क्या यह मेरे लिए संभव है कि मैं खुद को विस्मृत कर सकूं? तुरंत ‘हाँ’ या ‘नहीं’ मत कहिये। विचारिये। हम नहीं जानते कि इसका अर्थ क्या है। धार्मिक किताबों में यह और वह कहा गया है, लेकिन वह निरे शब्द हैं और शब्द यथार्थ नहीं होतें। मन के लिए महत्वपूर्ण यह है कि वो इकट्ठा देखे, अनुभवकर्ता, विचारक और देखनेवाला या ‘मैं’ क्या इसका विलोप हो सकता है? क्या यह स्वयं खो सकता है? यह तो पक्का हे कि कोई बाहरी अस्तित्व नहीं जो इसको गायब कर दे। यदि ‘मन’ यह कहता है कि ‘इस मैं’ को खत्म होना ही चाहिए क्योंकि इसके मिटने के बाद ही मुझे वह आनन्दमयी दशा प्राप्त होगी जिसका उल्लेख पवित्र किताबों में किया गया है, तो यह मात्र एक ऐसी क्रिया है जो इच्छा से प्रेरित है, और एक रूप है जो अस्तित्व में आना चाहता है, इस लिए ‘मैं’ अभी भी पूरी तरह बचा रहता है।
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