4 Nov 2009

एकाग्रता और ध्यान में अन्तर

अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को किसी विशेष बिन्दु पर फोकस करना एकाग्रता है। ध्यान में कोई बिन्दु विशेष नहीं होता जिस पर फोकस किया जाये। हम एकाग्रता से भलीभांति परिचित हैं पर हमें ध्यान की खबर नहीं। जब हम अपनी देह पर ध्यान देते हैं तब देह पूर्णतः शांत हो जाती है, जो कि उसका अपना अनुशासन है; तब देह विश्राम अवस्था में होती है लेकिन निष्क्रिय नहीं तब वहां पर समरसता की ऊर्जा होती है। जहाँ ध्यान होता है वहाँ विरोधाभास नहीं होता इसलिए कोई संघर्ष नहीं होता। जब आप कुछ पढ़ें तो ध्यान दें कि आप कैसे बैठे हैं, किस तरह सुन रहे हैं, कोई कुछ कह रहा है तो आप उसे कैसे ग्रहण करते हैं, कोई कुछ कहता है तो आप किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और यह कि आप ध्यान क्यों नहीं दे पाते हैं?
आपको यह सीखना नहीं है कि ध्यान कैसे देना है? कयोंकि यदि आप सीख रहे हैं तो आप एक व्यवस्था बना रहे हैं, अपने दिमाग में एक कार्यक्रम भर रहे हैं जिसके अनुसार चलना है तो आपका यह ध्यान यांत्रिक, एक तरह का दोहराव और स्वचालित हो जायेगा जबकि वास्तव में ध्यान ऐसा कुछ भी नहीं है।
ध्यान अपने सारे जीवन को देखने का तरीका है, बिना स्वरूचि के किसी केन्द्र के।
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