9 Dec 2009

विचार संवेदनाओं को आकार देते हैं




आपने किसी खूबसूरत कार को देखा, उसकी पॉलि‍श को छुआ, उसके रूप-आकार को देखा। इससे जो उपजा वह संवेदन है। उसके बाद विचार का आगमन होता है, जो कहता है ‘‘कितना अच्छा हो कि यदि यह मुझे मिल जाये। कितना अच्छा हो कि मैं इसमें बैठूं और इसकी सवारी करता हुआ कहीं दूर निकल जाऊँ’’ तो इस सब में क्या हो रहा है? विचार दखल देता है, संवेदना को रूप आकार देता है। विचार, आपकी संवेदना को वह काल्पनिक छवि देता है जिसमें आप कार में बैठे, उसकी सवारी कर रहे हैं। इसी क्षण, जबकि आपके विचार द्वारा ‘‘‘कार में बैठे होने, सवारी की जाने की’’ छवि तैयार की जा रही है, एक दूसरा काम भी होता है वह है इच्छा का जन्म।  जब विचार संवेदना को एक आकार, एक छवि दे रहा होता है तब ही इच्छा भी जन्मती है। संवेदना तो हमारे अस्तित्व... हमारे होने तरीका या उसका एक हिस्सा है। लेकिन हमने इच्छा का दमन, या उस पर जीत हासिल करना, या उसके साथ ही... उसकी सभी समस्याओं सहित जीना सीख लिया है। अब, यदि आप यह सब समझ गये हैं बौद्धिक रूप से ही नहीं पर यथार्थतः वास्तविक रूप में कि जब विचार संवदेना को आकार दे रहा होता है तभी दूसरी ओर इच्छा भी जन्म ले रही होती है तो अब यह प्रश्न उठता है कि क्या यह संभव है कि जब हम कार को देखें और छुएं जो कि संवेदना है.. उस समय समानान्तर रूप से....विचार किसी छवि को न गढे़। तो इस अंतराल को बनाये रखें। और शुभकामना ये की जा सकती है कि - आप इन सब में कहाँ पर हैं?
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क्या यह हो सकता है कि संवेदना ही हो, विचार न हो? प्रश्न है कि क्या कोई ऐसी जगह, एक अंतराल है... जहां पर केवल संवेदन हो, जहां ऐसा ना हो कि विचार आये और संवेदन पर नियंत्रण कर ले। यही समस्या है।
क्यों विचार छवि गढ़ता है और संवेदना पर कब्जा कर लेता है? क्या यह संभव है कि हम एक सुन्दर शर्ट को देखें, उसे छुएं... महसूस करें और ठहर जायें, इस अहसास में विचार को ना घुसने दें? क्या आपने कभी ऐसा कुछ करने की कोशिश की? जब विचार संवेदना या अहसास के क्षेत्र में आ जाता है  और विचार भी संवेदन ही है तब विचार संवेदना या अहसास पर काबू कर लेता है और इच्छा या कामना आरंभ हो जाती है। क्या यह संभव है कि हम केवल देखें, जांचें, सम्पर्क करें, महसूस करें..इसके अलावा और कुछ नहीं हो?
इस सब में अनुशासन की कोई जगह नहीं है क्योंकि जब क्षण से आप अनुशासन की शुरूआत करते हैं, यह भी कुछ प्राप्त करने या हो जाने की इच्छा का एक दूसरा ही रूप होता है।
तो हमें इच्छा को पैदा होते देखना है उसका आरंभ देखना है कि उन पलों में क्या होता है। आपको शर्ट तुरन्त ही खरीद नहीं लेनी है, पर देखना है कि होता क्या है? आप उसकी ओर देख सकते हैं, पर हम शर्ट के अतिरिक्त भी कुछ अन्य में ही आतुर होते हैं.... शर्ट, किसी आदमी, किसी औरत या कोई प्रतिष्ठापूर्ण स्थिति जिसके कारण कि हमारे पास वह धैर्यपूर्ण शांत समय नहीं है कि हम इन सब बातों की तरफ गौर करें।

Thought gives a shape to sensation

You see a beautiful car, you touch the polish, see its shape and texture. Out of that there is sensation. Then thought comes and says, “How nice it would be if I got it, how nice it would be if I got into it and drove off.” So what has happened? Thought has intervened, has given shape to sensation. Thought has given to sensation the image of you sitting in the car and driving off. At that moment, as that second, when thought creates the image of you sitting in the car, desire is born. Desire is born when thought gives a shape, an image, to sensation. Now, sensation is the way of existence, it is part of existence. But you have learnt to suppress, conquer, or live with desire with all its problems. Now, if you understand this, not intellectually but actually, that when thought gives shape to sensation, at that second desire is born, then the question arises: Is it possible to see and touch the car—which is sensation—but not let thought create the image? So keep a gap.
That Benediction is Where You Are, p 54

Can there be only sensation, and not thought?

Now, the question is whether there can be a hiatus, a gap; that is, have only sensation, and not let thought come and control sensation. That is the problem. Why does thought create the image and hold on to that sensation? Is it possible to look at the shirt, touch it—sensation—and stop, not allow thought to enter into it? Have you ever tried any of these? When thought enters into the field of sensation—and thought is also a sensation—then thought takes control of sensation, and desire begins. Is it possible to only observe, contact, sensation, and nothing else? And discipline has no place in this because the moment you begin to discipline, that is another form of desire to achieve something. So one has to discover the beginning of desire and see what happens. Don’t buy the shirt immediately, but see what happens. You can look at it; but we are so eager to get something, to possess a shirt, a man, a woman or some status that we never have the time, the quietness, to look at all this.
Mind Without Measure, pp 19-20


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