2 Nov 2009

ज्ञान के परदे की ओट के बिना देखना



अवलोकन में किसी तरह के संचित ज्ञान की जरूरत नहीं, हालांकि ज्ञान एक स्तर विशेष तक सहजतः आवश्यक है जैसे चिकित्सीय ज्ञान, वैज्ञानिक ज्ञान, इतिहास का ज्ञान और अन्य सारी चीजों का जो हैं। क्योंकि अंततः वो सब चीजें जो हो चुकी हैं, हैं -उनके बारे में सूचना, ज्ञान है। लेकिन भविष्य का कोई ज्ञान नहीं है, बस जो हो चुका है उसके ज्ञान के आधार पर लिए अंदाजे ही हमें भविष्य के साथ जोड़ने वाली कड़ी हैं। एक ऐसा मन जो ज्ञान के झीने परदे की ओट से देख रहा है वह विचार की तीव्र धारा का अनुगमन करने में सक्षम नहीं हो सकता। यदि आप अपनी ही सम्पूर्ण वैचारिक संरचना को देखना चाहते हैं तो आपको अपने ज्ञान के झीने परदे को हटाकर, अपनी सम्पूर्ण वैचारिक संरचना को सीधे देखना होगा।
जब आप सामान्य सहज रूप से, बिना आलोचना या स्वीकारने के, केवल अवलोकन मात्र करते हैं तब आप देखेंगे कि विचार का अंत भी है। यूं ही सामान्य तौर पर विचार आपको कहीं नहीं ले जाते। लेकिन यदि आप विचार की प्रक्रिया का अवलोकन, अवलोकनकर्ता और अवलोक्य के भेद के बिना कर पाते हैं, यदि आप विचार की सम्पूर्ण गति देख पाते हैं (बिना आलोचना या स्वीकार्य के) तो आपका यह अवलोकन, विचार का तुरन्त ही अंत पा जाता है - और इसलिए इस स्थिति में मन करूणापूर्ण होता है, वह निरंतर उत्परिवर्तन (सनातन) अवस्था में होता है।

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