13 May 2010

सुन्दर संसार की परिभाषा क्या है?


हम सोचते हैं कि परिभाषा को समझ लेने पर हम उस शब्द को समझ जायेंगे जिसे परिभाषित किया गया है। लेकिन परिभाषा समझ नहीं होती, बल्कि इसके विपरीत यह तो सोचने का सर्वाधिक विनाशक तरीका है। हम सुन्दर विश्व की परिभाषा इसलिए जानना चाहते हैं ताकि हमें इस बारे में चिंतन-मनन ना करना पड़े, दिमाग का इस्तेमाल ना करना पड़े, सब पका पकाया कोई हमे समझा दे। आप इस संबंध में किताबें उलट-पलट कर या दार्शनिकों-विचारकों के पास जाकर सुंदर विश्व का अर्थ जान लेना चाहते हैं, इससे आपको शब्दों के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। हकीकत यह है कि उस प्रत्येक व्यक्ति को जिसे कि ‘‘सुंदर विश्व’’ की परिभाषा यथार्थ में जाननी समझनी है उसे गहराई से इसका चिंतन मनन करना होगा और उस शब्द के पीछे का सत्य भी जानना होगा।
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आशा, विश्वास, भाव और मानसिक स्थिति के अनुसार सुन्दर विश्व का अलग-अलग अर्थ हो सकता है। हो सकता है कि दो अलग अलग व्यक्तियों की सुन्दर विश्व के बारे में अपनी अपनी परिभाषायें हों जो सर्वथा विपरीत हों।
अब जरा तथ्य देखिये हमारी दुनिया एक सड़ी गली दुनियां है, यहां युद्ध हैं, धार्मिक, जातिवादी, आर्थिक, मानसिक सब तरह के विभाजन हैं। यह एक भ्रष्ट और विकृत संसार है।
शब्दों में बह जाना ठीक नहीं। हमें बचपन से ही हमेशा यह सिखाया जाता है कि क्या सोचें,,, यह हमें कभी नहीं सिखाया जाता कि कैसे सोचें?
‘सिमेंटिक्स’ नामक विज्ञान में शब्दों के तात्पर्य का अध्ययन किया जाता है। जो भी शब्द आज वर्तमान में प्रचलित हैं, या नये शब्द अस्तित्व में आ रहे हैं उनके विकास के मूल में एक संपूर्ण विज्ञान है। चूंकि शब्द हमें मानसिक और साथ ही भौतिक रूप से भी प्रभावित करते हैं अतः यह महत्वपूर्ण है कि हम उन्हें समझें पर उनसे अप्रभावित रहें। जिस क्षण साम्यवाद शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, यदि कोई पूंजीवादी सरोकार वाला व्यक्ति उसे सुन ले तो उसे कंपकंपी छूटने लगती है। किसी गुरू के अनुयायी को आप यह समझायें कि ‘‘दूसरे के अनुयायी मत बनो, अनुयायी बनना नासमझी है’’ तो वह तुरन्त तनकर खड़ा हो जायेगा और आपको भागने पर मजबूर कर देगा। शब्दों से होने वाला यह निरंतर भय समझ के अभाव के कारण होता है।
आखिर शिक्षा का यही तो अर्थ है - शब्दों के माध्यम से दिये जाने वाले संप्रेषण को समझना, ना कि शब्दों में उलझ कर रह जाना।
सुंदर विश्व जैसी कोई चीज नहीं होती। चीजें जैसी हैं हमें उन्हें वैसा ही स्वीकारें, ना कि किसी आदर्श की तरह। विश्व कैसा होना चाहिए इस बारे में कोई आदर्श ना रखें। सभी आदर्श - आदर्श विद्यालय, आदर्श देश, आदर्श नायक, या अहिंसा आदि के सारे आदर्श बेतुके और हास्यास्पद होते हैं.. भ्रामक होते हैं। तथ्यतः वास्तविक वही है जो है। यदि सही मायने में हम विभिन्न चीजों को - गरीबी-भुखमरी, अलगाव, कटुता, आकांक्षा, लोभ, भ्रष्टाचार, भय आदि को जैसे वे हैं वैसा का वैसा ही उन्हें यथारूप समझ लें तो हम सब इनसे निपट सकते हैं, इन्हें मिटा सकते हैं। किंतु यदि हम आदर्श बनाते हैं, हम कहते हैं कि मुझे यह अथवा वह होना चाहिए तो हम भं्रातियों में भटकने लगते हैं। हमारे देश में सदियों से निरंतर जिन आदर्शों की घुट्टी पिलाई जाती रही है वे सभी भ्रम हैं। अतः क्या यह उचित नहीं होगा कि अहिंसा की बातें करने की बजाय हिंसा को समझा जाए? यदि आप ‘‘जो हैं’’ की समझ रखते हैं तो ही किसी वास्तविक क्रांति की संभावना बनती है।

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