27 Nov 2010

हमारा परम यथार्थ यही है।


कोई हमारी खुशामद करता है, हमें अपमानित या दुखी करता है या हमें चोट पहुंचाता है या प्यार जताता है तो इन सब बातों को हम संग्रह क्यों कर लेते हैं? इन अनुभवों को ढेर और इनकी प्रतिक्रियाओं के अलावा हम क्या हैं? हम कुछ भी नहीं हैं अगर हमारा कोई नाम ना हो, किसी से जुड़ाव ना हो, कोई विश्वास या मत ना हो। यह ना कुछ होने का भय ही हमें बाध्य करता है कि हम इन सब तरह के अनुभवों को इकट्ठा करें, संग्रह करें। और यह भय ही, चाहे वो जाने में हो या अनजाने में, यह भय ही है जो हमारी एकत्र करने... संग्रह करने की गतिविधियों के बाद हमें अन्दर ही अन्दर तोड़ने... विघटन और हमारे विनाश के कगार पर ले आता है।
यदि हम इस भय के सच के बारे में जान सकें, तो यह सत्य ही हमें इस भय से मुक्त करता है ना कि किसी भय से मुक्त होने के उद्देश्य से लिया गया कोई संकल्प। क्योंकि वाकई हम कुछ भी नहीं हैं। हमारा नाम और पद हो सकता है, हमारी संपत्ति और बैंक में खाता हो सकता है, हो सकता है आपके पास ताकत हो और आप प्रसिद्ध भी हों, लेकिन इन सब सुरक्षा उपायों के बावजूद हम कुछ नहीं हैं। आप इस नाकुछ होने, खालीपन से अनजान हो सकते हैं या आप सहज ही नहीं चाहते कि आप इस नाकुछपने को जाने लेकिन ये हमेशा यहीं.. आपके पास ही, अन्दर ही होता है..। आप होते ही नहीं, यही होता है, आप इससे बचने के लिए चाहे जो कर लें। आप इससे पलायन के लिए चाहे कितने ही कुटिल उपाय कर लें, कितनी ही वैयक्तिक या सामूहिक हिंसा कर लें, वैयक्तिक या सामूहिक पूजा-पाठ सत्संग कर लें, ज्ञान या मनोरंजन के द्वारा इससे बचें लेकिन जब भी आप सोयें या जागें- हमारा नाकुछपना हमेशा यहीं होता है। आप इस नाकुछ होने और इसके भय से केवल तभी संबंध बना सकते हैं जब आप, अपने इससे बचाव या पलायन के प्रति बिना पसंद या नापसंद के जागरूक रह सकें। 

आप इससे किसी अलग या वैयक्तिक शै की तरह नहीं जुड़े हैं। आप वो अवलोकनकर्ता नहीं हैं, जो इसे एक दूरी से इसे देख रहे हैं लेकिन आपके बिना, जो कि सोच रहा है, अवलोकन कर रहा है यह नहीं है। आप और यह नाकुछपना एक ही है। आप और यह नाकुछ होना एक संयुक्त घटना है दो अलग-अलग प्रक्रम नहीं हैं। यदि आप, जो कि सोचने वाले हैं, इससे डरे हुए हैं और इससे ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे यह आपसे कुछ अलग या विपरीत है, तो आपके द्वारा इसके प्रति उठाया गया कोई भी कदम निश्चित ही.. अनिवार्यतः आपको भ्रम और उससे उपजे द्वंद्व और विपदाओं, संतापों में ले जायेगा।
जब यह पता चल जाता है कि इस नाकुछपने को को अनुभव करने वाले आप ही हैं तब वह भय जो कि तभी रहता है जब कि विचार करने वाला अपने विचार से अलग रहता है और इसलिए इससे कोई सम्बंध स्थापित करना चाहता है, यह भय पूरी तरह खो जाता है।  केवल तभी मन के लिए थिर या अचल हो पाना संभव होता है और इस शांति, निर्वेदपन में ही परमसत्य होता है।

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