11 Nov 2009

पहला कदम, ही आखिरी कदम है



पहला कदम है जानना, बूझना, समझना, महसूस करना।
यह समझना कि आप क्या सोचते हैं, अपनी महत्वाकांक्षाओं को समझना, अपने गुस्से को, अपने अकेलेपन, अपनी निराशा, अपने दुख की असामान्यता को समझना... इन सब बातों को बिना आलोचना किये, बिना न्यायसंगत ठहराये, इन्हें बदलने की इच्छा किये बिना समझना, बूझना, महसूस करना, जानना ही पहला कदम है। इन्हें हमें जैसा का तैसा जानना और समझना है। जब आप इन्हें जैसे हैं वैसा का वैसा देखते-समझते जान जाते हैं तब एक अलग ही तरह का सहज कर्म आपसे स्वमेव ही होता है और यह निर्णायक होता है। यानि जब आप किसी चीज को सही जानते हैं तो वह सही और गलत जानते हैं वह अन्तिम रूप से गलत होती है, यह समझ-बूझ-जानने से उठा कर्म ही तत्संबंधी अंतिम कर्म होता है।
देखिये यदि मैं जान जाता हूं कि किसी का अनुकरण करना गलत है, किसी के निर्देशों का अनुसरण करना गलत है फिर चाहे वह कोई भी हो, कृष्ण, बुद्ध या जीसस कोई भी हो यह मुद्दा नहीं कि वह कौन है? तो मैंने यह सच देखा कि किसी का भी अनुकरण करना, नकल करना गलत है। क्योंकि मैंने अपने तर्क, चेतना आदि अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से यह जाना कि यह गलत है तो यह जानना इस संबंध में निर्णायक चरण है। मैं यह जानता हूं और अनुकरण करना छोड़ देता हूं, उसे विस्मृत कर देता हूं क्योंकि उसके बाद जाना जाने वाला सर्वथा नूतन है और वह पुनः एक निर्णायक चरण है।

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