26 Oct 2009

जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?

केवल देखने, सुनने के अतिरिक्त, सीखना क्या है?
सीखें पर किसी मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ के कहे अनुसार नहीं। आप अपने आप को ही लें, अपने आप को ही देखें - बिना किसी आलोचना या प्रशंसा, निर्णय लेने के उद्देश्य से, या तुच्छता से अलग थलग पटक देने जैसे नहीं....बस.... मात्र देखें। उदाहरण के लिए देखें कि ”मैं घमंड करता हूं“ पर अब यह नहीं करना कि घमंड बुरी चीज है, या अच्छी, या गंदी चीज है... नजरिया बनाकर नहीं देखना है... बस केवल देखें। जैसे-जैसे हम निरपेक्ष, बिना किसी विक्षेप के यथावस्तु देखते हैं, हम सीखते हैं। देखना, मतलब सीखना कि अहं या घमंड में क्या-क्या शामिल है, यह जन्म कैसे लेता है, कैसे यह हमारे मन में गहरे कोनों में पैठा रहता है या सामने ही सामने फूलता-फलता है, और हमें ही इसकी फसल काटनी पड़ती है। जैसे हम अपने आप को ध्यानपूर्वक देखते हैं, तुरंत सीखते हैं। अब इसमें याद रखने और अनुभव करने जैसी कोई बात नहीं कि बाद में उससे सबक लेंगें।
तो यह बहुत कठिन है पर, यह केवल कुछ क्षणों 2-5 मिनट का काम है। ध्यानपूर्वक, जागरूक या सावधान-अवधानपूर्ण रहना बहुत कठिन है। हमारा मन बार-बार असावधान होता है तो उन क्षणों में जब आप असावधान हैं यह देखें-जाने कि असावधानता क्या है? हमें सावधान होने की कोशिश नहीं करनी, खुद से ही संघर्ष या लड़ना नहीं है पर यह देखना है कि यह असावधानता क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? इस असावधानता के प्रति पूरी तरह होशवान, सावधान रहें। यहीं ठहरें। यह ना कहें कि मैं अपना पूरा समय सावधान, होशपूर्ण रहने में ही लगाऊंगा। इससे ज्यादा गहराई में जाना जटिलता पैदा करेगा। यह हमारे मन का एक गुण है कि वह हर समय जागता है और देखता रहता है, और सीखना इसके अलावा कुछ है भी नहीं। जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
Share/Bookmark