20 Jul 2009

सजगता द्वारा मैं खुद को देखना शुरू करता हूं, जैसा कि वास्तविकता में मैं हूं, अपने स्वयं का पूर्णत्व। प्रत्येक क्षण की गति को देखते हुए उसके सभी विचारों, उसके अहसासों, उसकी प्रतिक्रियाओं, अचेतन औ चेतन भी मन .... निरंतर अपनी गतिविधियों का अर्थ महत्व खोजता रहता हैं। यदि मेरी समझ मात्र कुछ चीजों का जोड़ है, तो यह जोड़ एक शर्त बन जाता है जो मेरी आगे की समझ को रोकती है। तो क्या मस्तिष्क स्वयं को बिना कुछ जोड़े घटाये जैसा है वैसा का वैसा ही देख सकता है?

एक स्पष्टता जो किसी कारण विशेष से नहीं होती - जब मन और शरीर की प्रत्येक क्रिया के बारे में अंर्तमुखी सजगता रहती है, जब आप अपने विचारों, खुले और दबे ढंके हुए सभी अहसासों, चेतन और अवचेतन के प्रति सजगता रखते हैं तब इस सजगता से एक स्पष्टता आती है जो बिना किसी कारण विशेष के होती है। जिसे बुद्धि के साथ एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस स्पष्टता के बिना आप जो करें, आप स्वर्ग, सारी धरती और कई अतल गहराईया छान लें लेकिन आप बिलकुल ही नहीं जान सकते कि सच क्या है?
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यदि आप बाहरी चीजों के प्रति होशवान हैं

कृपया इसे ध्यानपूर्वक सुनें। हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि सजगता, ध्यान कुछ रहस्यमयी चीज है जिसका अभ्यास करना चाहिए और जिसके लिए बार-बार हम इकट्ठे होते और, बातें करते हैं। लेकिन इस तरीके से कभी होशवान नहीं हुआ जाता। लेकिन यदि आप बाहरी चीजों के प्रति होशवान हैं - दूर तक चली गई सड़क के सर्पीले घुमावदार लहराव, वृक्ष का आकार, किसी के पहनावे का रंग, नीले आसमान की पृष्ठ भूमि में किसी पर्वत का रेखाचित्र, किसी फूल का सौन्दर्य, किसी पास से गुजरते व्यक्ति के चेहरे पर दुःखदर्द के चिन्ह, किसी का हमारी परवाह न करना, दूसरों की ईष्र्या, पृथ्वी की सुंदरता..... तब इन सब बाहरी चीजों को बिना किसी आलोचना के, बिना पसंद नापसंद किये, देखना...... इससे आप आंतरिक अंर्तमुखी सजगता की लहर पर भी सवार हो जाते हैं। तब आप अपनी ही प्रतिक्रियाओं, अपनी ही क्षुद्रता, अपने ईष्र्यालुपन के प्रति भी होशवान हो सकते हैं । बाहरी सजगता से आप आंतरिक सजगता की ओर आते हैं। लेकिन यदि आप बाह्य बाहरी के प्रति सजग नहीं होते हैं तो आपका अंातरिक अंर्तमुखी सजगता पर आना असंभवप्राय है।
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