5 Jun 2014

हम अकेलेपन का सामना क्यों नहीं करते?


हम सभी को जर्बदस्त अकेलेपन का अनुभव होता है, जब किताबें, धर्म आदि, सब कुछ चला जाता है, हम अन्दर ही अन्दर भयंकर अकेलापन और खालीपन महसूस करते हैं।
हममें में से अधिकतर लोग इस खालीपन, इस अकेलेपन का सामना नहीं करते और हम इससे भागते हैं, पलायन करते हैं। निभर्रता एक ऐसी ही चीज है...जिस ओर हम भागते हैं, हम किसी पर निर्भर हो जाते हैं... क्योंकि हम अपने अकेलेपन के साथ ही खड़े नहीं रह पाते।
रेडियो या किताबें या लोगों से बातें और लगातार यहां-वहां की बातें, कला और संस्कृति जैसी चीजें... हमें चाहिए ही होती हैं। आधुनिक युग में इंटरनेट पर सोशल वेबसाईट की गतिविधियां और चेटिंग कर्म भी इसी श्रंखला की चीजें हैं।
तो हम इस बिन्दु पर पहुंचते हैं कि हम जानते हैं कि यहां स्वयं के अलगाव, अकेलेपन का यह एक असाधारण अहसास होता है।
भले ही हमारे पास एक अच्छी नौक्री हो, हम जोरधार काम-काज में लगे हों, किताबें लिख रहे हों, पर अन्दर ही अन्दर एक भयंकर निर्वात सा होता है। हम इस खालीपन को भरना चाहते हैं और किसी चीज पर निर्भर होना, इस खालीपन को भरने का एक तरीका होता है।
हम इस निर्भरता का इस्तेमाल करते हैं, मनोरंजन, मंदिर या चर्च जाना, सामाजिक कार्य, धर्म, शराब, शबाब, ऐसी ही दर्जनों चीजें इस अकेलेपन को भरने के लिए इस्तेमाल होती हैं।
अगर हम देखें कि इसे ढंकने की कोशिश बहुत ही बेकार होती है, पूरी तरह व्यर्थ। मौखिक रूप से ही नहीं, आपके मानने की ही बात नहीं, ना ही आपकी सहमति या किसी फैसले की तरह... बल्कि यदि हम इस बात की कुल निरर्थकता, अनुपयुक्तता को देखें तब शायद हम इसमें जो तथ्य है उसका सामना कर पायें।
यहां यह प्रश्न नहीं है कि इस निर्भरता से मुक्त कैसे हों? यह प्रश्न तथ्य नहीं है, यह तो तथ्य को दी गई प्रतिक्रया मात्र है। क्यों हम, तथ्य का सामना नहीं करते, और यह नहीं देखते कि ‘अब क्या होता है?’

अब जो समस्या पैदा होती है वह है अवलोकनकर्ता और अवलोक्य या अवलोकन की। जो ‘देख रहा है’ और ‘जो दिख रहा है’ उसकी। अवलोकनकर्ता कहता है, मैं खाली हूं; मैं यह पसंद नहीं करता और उससे दूर भागता है। अवलोकनकर्ता कहता है कि ”मैं खालीपन या रिक्तता से परे हूं, अलग हूं।“ लेकिन अवलोकनकर्ता ही खालीपन या रिक्तता है; यह कुछ ऐसा नहीं कि खालीपन या रिक्तता किसी अवलोकनकर्ता द्वारा देखी जा रही होती है। अवलोकनकर्ता ही अवलोक्य है। जो ‘‘देख रहा है’’, वह ही ‘‘देखा जा रहा’’ भी है। यही वह जगह है जहां अगर तथ्य का अहसास हो जाये, विचारणा में अनुभव-अहसास में जर्बरर्दस्त क्रांति होती है,

Most of us can't face that emptiness

We have all had the experience of tremendous loneliness, where books, religion, everything is gone and we are tremendously, inwardly, lonely, empty. Most of us can't face that emptiness, that loneliness, and we run away from it. Dependence is one of the things we run to, depend on, because we can't stand being alone with ourselves. We must have the radio or books or talking, incessant chatter about this and that, about art and culture. So we come to that point when we know there is this extraordinary sense of self-isolation. We may have a very good job, work furiously, write books, but inwardly there is this tremendous vacuum. We want to fill that and dependence is one of the ways. We use dependence, amusement, church work, religions, drink, women, a dozen things to fill it up, cover it up. If we see that it is absolutely futile to try to cover it up, completely futile, not verbally, not with conviction and therefore agreement and determination, but if we see the total absurdity of it , then we are faced with a fact. It is not a question of how to be free from dependence; that's not a fact; that's only a reaction to a fact. Why don't I face the fact and see what happens?
The problem now arises of the observer and the observed. The observer says, "I am empty; I don't like it" and runs away from it. The observer says, "I am different from the emptiness." But the observer is the emptiness; it is not emptiness seen by an observer. The observer is the observed. There is a tremendous revolution in thinking, in feeling, when that takes place.

J. Krishnamurti, The Book of Life

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