22 Feb 2010

आमूलचूल क्रांति‍

क्या आप कोई ऐसी क्रांति चाहते हैं जो आपकी सारी संकल्पनाओं, विश्वासों, मूल्यों, आपकी नैतिकता, आपकी सम्मानीयता, आपके ज्ञान को तहस-नहस कर दे। इस प्रकार तहस नहस कर दे कि आप अत्यंतिक सम्पूर्ण रूप से नाकुछ हो जायें, यहां तक कि आपका कोई चरित्र ही न बचे। वो व्यक्ति ही न बचे जो खोजी है, जो आदमी फैसले करता है, जो क्रोधी और अक्रोधी है। आप पूर्णतः कुछ भी होने से खाली हो जायें, जो भी ‘‘आप’’ हैं।
यह खालीपन अपने चरम तप सहित परम सौन्दर्य होता है जिसमें कठोरता या आक्रामकता का दावा करती कोई चिंगारी नहीं होती। यही उस भेद का अर्थ है जो बाद में वहां होता है। वहा आश्चर्यजनक समझ बोध होता ही है, ना कि सूचना और सीखना। यही विवेक या समझ बोध सर्वदा रहता है, आप चाहे सो रहे हों या जाग रहे हों। इसलिए हम कहते हैं कि वहां केवल अन्दर और बाहर का अवलोकन होना चाहिए जो कि बुद्धि मस्तिष्क को तीक्ष्ण करता है। मस्तिष्क की यह तीक्ष्णता उसे शांत बनाती है। मस्तिष्क की इस संवेदनशीलता और समझ बोधपरकता ही विचार को संचालित करती है जब उसकी आवश्यकता हो, अन्य समय मस्तिष्क सोया नहीं रहता पर द्रष्टा हो शांत हो रहता है। इसलिए मस्तिष्क या दिमाग अपनी प्रतिक्रियाओं से संघर्ष नहीं पैदा करता। यह बिना किसी जूझने के, इसलिए बिना किसी विक्षिप्तता या विक्षेप के काम करता है। तब करना और होना या किया जाना और अमल में होना तुरत एकसाथ होता है, वैसे ही जैसे कभी आप खतरे में पड़ें और जो बन पड़े तुरन्त सम्पन्न कर दें। इसलिए वहां पर हमेशा संकल्पनात्मक चीजों से मुक्ति रहती है। यह संकल्पनात्मक चीजें ही हैं जो अवलोकनकर्ता, मैं, अहं हो जाती हैं, जो बांटती हैं, प्रतिरोध करती हैं और अवरोध बनाती हैं। जब ‘मैं’ नहीं होता, तो सफलता, फल या परिणाम का कोई भेद नहीं रहता तब सम्पूर्ण जीवन, सौन्दर्य को जीना होता है। तब सम्बंधों में भी सौन्दर्य होता है बिना किसी एक छवि को दूसरी छवि से प्रतिस्थापित किये। तभी अनन्त महानता का अवतरण संभव होता है।


Is this really what you are seeking? Is it really what you want? If you do, there must be the total revolution of your being. Is this what you want? Do you want a revolution that shatters all your concepts, your values, your morality, your respectability, your knowledge - shatters you so that you are reduced to absolute nothingness, so that you no longer have any character, so that you no longer are the seeker, the man who judges, who is agressive or perhaps non-aggressive, so that you are completely empty of everything that is you? This emptiness is beauty with its extreme austerity in which there is not a spark of harshness or agressive assertion. That is what breakthrough means and is that what you are after? There must be astonishing intelligence, not information or learning. This intelligence operates all the time, whether you are asleep or awake. That is why we said there must be the observation of the inner and the outer which sharpens the brain. And this very sharpness of the brain makes it quiet. And it is this sensitivity and intelligence that make thought operate only when it has to; the rest of the time the brain is not dormant but watchfully quiet. And so the brain with its reactions doesn't bring about conflict. It functions without struggle and therefore without distortion. Then the doing and the acting are immediate, as when you are in danger. Therefore there is always a freedom from conceptual accumulations. It is this conceptual accumulation which is the observer, the ego, the "me" which divides, resists and builds barriers. When the "me" is not, the breakthrough is not, then there is no breakthrough; then the whole of life is in the beauty of living, the beauty of relationship, without substituting one image for another. Then only the infinitely greater is possible.
 
Meeting Life Early Works, circa 1930 

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