12 Jul 2011

मानव का अस्तित्व क्यों हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?


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मानव का अस्तित्व क्यों हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?
आप इसलिए है क्योंकि आपके माता-पिता ने आपको जन्म दिया है, और आप भारत के ही नहीं, विश्व की सम्पूर्ण मानवता के शताब्दियों के विकास का परिणाम हैं। आप किसी असाधारण अनूठेपन से नहीं जनमें हैं बल्कि आपके साथ पंरपरा की पूरी पृष्ठभूमि है। आप हिन्दू या मुस्लिम हैं। आप पर्यावरण-वातावरण, खानपान, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेशों और आर्थिक दबावों से उपजे हैं। आप अनेकों शताब्दियों का, समय का, द्वंद्वों का, दर्दों का, खुशियों का और लगाव चाव का परिणाम हैं। आपमें से हर कोई जब यह कहता है कि वह एक आत्मा है, जब आप कहते हैं कि आप शुद्ध ब्राहम्ण हैं, तो आप केवल परंपरा का, किसी संकल्पना का, किसी संस्कृति, भारत की विरासत, भारत की सदियों से चली आ रही विरासत का ही अनुकरण कर रहे होते हैं।
प्रश्न है कि जीवन में आपका ध्येय क्या हो? तो पहले तो आपको अपनी पृष्ठभूमि को समझना होगा। यदि आप पंरपरा, संस्कृति को, समूचे परिदृश्य को नहीं समझते, तो आप अपनी पृष्ठभूमि से उपजे किसी आईडिये, मिथ्या अर्थ को मान लेंगें और उसे ही अपने जीवन का ध्येय कहने लगेंगे। माना कि आप हिन्दू हैं और हिन्दू संस्कृति में पले बढ़े हैं। तो आप हिन्दूवाद से उपजे किसी सिद्धांत या भावना को चुन लेंगे और उसे अपने जीवन का ध्येय बना लेंगे। लेकिन क्या आप किसी अन्य हिन्दू से अलग, पूरी तरह अलग तरह से सोच सकते हैं? यह जानने के लिए कि हमारे अंतर्तम की क्या संभावनाएं या हमारा अंतर्तम क्या गुहार लगा रहा है, क्या कह रहा है? यह जानने के लिए किसी व्यक्ति को इन सभी बाहरी दबावों से, बाहरी दशाओं से मुक्त होना ही होगा। यदि मैं किसी चीज की जड़ तक जाना चाहता हूं तो मुझे यह सब खरपतवार या व्यर्थ की चीजें हटानी होंगी जिसका मतलब है मुझे हिन्दू मुसलमान होने से हटना होगा और यहां भय भी नहीं होना चाहिए, ना ही कोई महत्वाकांक्षा, ना ही कोई चाह। तब मैं कहीं गहरे तक पैठ सकता हूं, और जान सकता हूं कि हकीकत में यथार्थ संभावनाजनक, या सार्थक क्या है। लेकिन इन सबको हटाये बिना मैं जीवन में सार्थक क्या है इसका अंदाजा नहीं लगा सकता। ऐसा करना मुझे केवल भ्रम और दार्शनिक अटकलबाजियों में ही ले जायेगा।

तो यह सब कैसे होगा?
पहले तो हमें सदियों से जमी धूल को हटाना होगा, जो कि बहुत आसान नहीं है। इसके लिए गहरी अन्र्तदृष्टि की जरूरत है। इसमें आपकी गहरी रूचि होनी चाहिए। संस्कारों का निर्मूलन, परंपराओं, अंधविश्वासों, सांस्कृतिक प्रभावों की धूल को हटाने के लिए खुद को... अपने आपको समझने की आवश्यकता होती है ना कि किताबों से या किसी शिक्षक से सीखने की... यही ध्यान है।
जब मन अपने आपको सारे अतीत की धूल से साफ कर लेता है, मुक्त कर लेता है.. तब आप अपने अस्तित्व की सार्थकता के बारे में बात कर सकते हैं। आपने यह प्रश्न किया है, तो अब इस पर आगे बढ़ें, तब तक लगे रहें जब कि यह ना जान लें -कि क्या कोई ऐसी किसी वास्तविक, मौलिक, अभ्रष्ट चीज है भी? यह ना कहें कि ”हां, वाकई ऐस कुछ है“ या ”ऐसा कुछ नहीं होता“। बस इस पर काम करना जारी रखें, तलाशने, पाने, जानने की कोशिश ना करें क्योंकि आप जान नहीं पायेंगे। एक ऐसा मन जो भ्रष्ट है वो उस चीज को कैसे जान सकता है जो कि शुद्ध है, भ्रष्ट नहीं है। क्या मन खुद को साफ शुद्ध कर सकता है? हां कर सकता है। और यदि मन अपने आपको शुद्ध साफ कर सकता है, तब आप देख सकते हैं, तब आप जान सकते हैं, पता लगा सकते हैं। मन का परिष्करण, शुद्धिकरण ध्यान है।

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