23 Sep 2009

कोई अपने ही बारे में, छवि क्यों बनाता है?

किसी भी व्यक्ति की अपने बारे में एक संकल्पना, खुद का ही छविचिन्ह या छवि होती है - कि उसे क्या होना चाहिए, क्या है, या यह कि उसे क्या नहीं होना चाहिए।
आईये जाने कोई भी व्यक्ति अपने बारे में छवि क्यों बनाता है? क्योंकि वो इसका अध्ययन कभी नहीं करता कि वह वास्तव में वो क्या है, यथार्थतः क्या है? हम सोचते हैं कि हमें यह होना चाहिए या वह होना चाहिए, आदर्श, नायकों, या कल्पना या इतिहास के उदाहरण पुरूषों की तरह।

हम जब भी जागरूक होते हैं हमारी अपने ही बारे में कल्पना, आदर्श हम पर हमला करते हैं। हमारा अपने ही बारे में जो खयाल है वह, हम जो तथ्यरूप.. वास्तव में हैं उससे.. पलायन बन जाता है। लेकिन जब आप स्वयं को तथ्य रूप में देखतें हैं जो कि आप वास्तव में हैं, तब कोई भी आपको दुख नहीं पहुंचा सकता। तब यदि कोई व्यक्ति झूठा है और उसे कोई झूठा कहता है तो इसका मतलब यह नहीं कि झूठा कहने वाला उसे दुख पहुंचा रहा है, क्योंकि यह तो तथ्य ही है। लेकिन यदि आपका अपने बारे में यह खयाल है कि आप झूठे व्यक्ति नहीं हैं, और कोई कहता है कि आप झूठें हैं तो आप गुस्सा हो जाते हैं, हिंसक हो जाते हैं।

हम लोग हमेशा एक आदर्शलोक में जीते हैं, कल्पनालोक में जीते हैं... मिथकों में जीते हैं उस जगत में नहीं जो यथार्थतः है। जो वास्तव में है उसे देखने के लिए... उसका जांच पूछ परख, यथार्थ से परिचय के लिये - हमें पूर्वाग्रह, पूर्व में ही निर्णय, मूल्यांकन, उसके बारे में भय आदि बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
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