26 Mar 2014

अगर आप अहसास को कोई नाम ना दें


जब आप किसी अहसास या भाव को देखें, तो वह स्वतः ही विलीन हो जाता है। लेकिन जब किसी अहसास के समाप्ति के बाद भी, यदि वहाँ कोई अहसास को देखने वाला होता है, एक दर्शक होता है, महसूस करने वाला या एक एक विचारक होता है जो उस मूल बीते अहसास से अलग... उस अहसास की स्मृति बन रहता है...तो वहां पर भी द्वंद्व होता है। तो बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह समझना कि हम किसी अहसास को, भाव को किस तरह देखते हैं। तो पल भर के लिए हम एक बहुत ही सामान्य अहसास या भाव या अनुभूति -जलन को लें। हम सब जानते हैं कि जलन क्या होती है या एक जलकुकड़ा होना क्या होता है। तो अब आप अपनी जलन को देखे... इसे आप कैसे देखते हैं? जब आप इस भाव को देखते हैं, आप जलन के अवलोकनकर्ता होते हैं... अपने आप से कुछ अलग। आप जलन को बदलने या उसके प्रारूप में बदलाव की कोशिश करते हैं, या उस जलन की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं... आप देखिये कि आप किस तरह अपनी जलन को न्यायसंगत तर्कसंगत दिखाने की कोशिश करते हैं ... इसी तरह अन्य बातें। तो यहां पर एक तो अस्तित्व होता है, संवेदक होता है और एक चीज होती है जलन से अलग... जो कि जलन को देखती है। कुछ पल के लिए जलन गायब हो जाती है, पर फिर पुनः लौट आती है... वह लौट आती है इसलिए कि आप वाकई उसकी ओर उस तरह नहीं देखते कि वह आपका ही हिस्सा है, आप ही हैं।

तो मैं यह कहना चाहता हूं कि जिस क्षण आप उस भाव को एक नाम देते हैं, किसी अहसास पर एक लेबल लगा देते हैं... आप पुनः अतीत के ढांचे से निकालकर उसे अतीत का ही सातत्य दे देते हैं। अतीत का वह ढांचा क्या है ? वह है . आपका वह दर्शक होना... वह अलग अपनी ही छवि जो शब्दों, कल्पनाओं और क्या सही है? और क्या गलत? के विचारों के भेद से बनी है। किन्तु यदि आप भाव को या अहसास को नाम नहीं देते जिसके लिए कि बहुत ही होशपूर्ण होने की आवश्यकता है ... तो तुरन्त ही आप समझ के एक अन्य ही आयाम में पहुंच जाते हैं जहां अवलोकनकर्ता नहीं होता, विचारक नहीं होता... वह केन्द्र नहीं होता, जहां से आप निर्णय करते हैं... जहां आप जानते हैं कि आप अहसास से अलग-कुछ  नहीं हैं.. तब वहां कोई भी ‘मैं’ नहीं होता जो किसी अहसास को महसूसता है। 


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