12 Dec 2009

जहां इच्छा हो, क्या वहां प्रेम के लिए कोई जगह बचती है?

हम अपनी इच्छाओं के लिए पागल हुए जाते हैं, हम अपने आपको इच्छा द्वारा तुष्ट करना चाहते हैं। लेकिन हम यह नहीं देखते कि वैयक्तिक सुरक्षितता की इच्छा, व्यक्तिगत उपलब्धि, सफलता, शक्ति, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा...आदि इन इच्छाओं ने इस संसार में क्या कहर बरपाया हुआ है। हमें यह अहसास तक नहीं है कि हम ही उस सब के जिम्मेदार हैं जो हम कर रहे हैं।  अगर कोई इच्छा को, उसकी प्रकृति को समझ जाये तो उस इच्छा का स्थान या मूल्य ही क्या है?  क्या वहां इच्छा का कोई स्थान है जहां प्रेम है? या जहां इच्छा हो, क्या वहां प्रेम के लिए कोई जगह बचती है?


Desire and love

We are all so crazy about desire, we want to fulfil ourselves through desire. But we do not see what havoc it creates in the world—the desire for individual security, for individual attainment, success, power, prestige. We do not feel that we are totally responsible for everything we do. If one understands desire, the nature of it, then what place has it? Has it any place where there is love?
The Network of Thought, p 49
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आदर-सम्मान धरती पर सबसे भयानक और घृणित चीज है



प्रेम के बिना आप नैतिक नहीं हो सकते! वास्तव में आपके पास प्रेम है ही नहीं। आपके पास खुशी या मजा है, उत्तेजना या रोमांच है, यौन संबंध हैं उसी तरह जैसे कि एक परिवार है, पत्नि या पति है, जिस तरह देश से जुड़ाव है। लेकिन ये जुड़ाव सा सम्बंध प्रेम नहीं। और प्रेम कुछ ऐसा नहीं कि बहुत दिव्य हो या अपवित्र ची हो । प्रेम में विभाग या भेद है ही नहीं। प्रेम का मतलब है कुछ ऐसा, जिसका आप ध्यान रखें, खयाल रखें। जैसे किसी वृक्ष की देखभाल, संरक्षण या पड़ोसी का ध्यान या खयाल रखना या अपने ही बाल बच्चों की देखभाल और ख्याल रखना। यह ध्यान रखना कि आपका बच्चे को उचित शिक्षा मिले, यह नहीं कि स्कूल भेज दिया और भूल गये। उचित शिक्षा का मतलब ये भी नहीं कि उसे बस तकनीकी शिक्षा दी जाये। यह भी देखना कि बच्चे को उचित सही शिक्षक मिले, सही भोजन पानी मिले... बच्चा जीवन को समझे, सैक्स को समझे। बच्चे को केवल ऐसी शिक्षा देना जिसमें वे भूगोल, गणित या तकनीकी चीजें सीख ले... जो उसको काम धंधा दिलाने में काम आयें, ये प्रेम नहीं है।
प्रेम के बिना आप नैतिक नहीं हो सकते। हो सकता है आप सम्मानीय हो जायें, समाज के अनुरूप हो जायें, कि आप चोरी नहीं करेंगे, पड़ोसी की पत्नी को लाईन नहीं मारेंगे आप यह नहीं करेंगे वो नहीं करेंगे।  लेकिन यह नैतिकता नहीं है, यह शील या सद्गुण नहीं है, यह केवल सम्मानीयता के अनुरूप होना है। आदर’-सम्मान धरती पर सबसे भयानक और घृणित चीज है क्योंकि ये बहुत ही कुरूप चीजों पर पर्दा डालता है। जहां पर प्रेम होता है वहां पर ही नैतिकता होती है। जहां पर प्रेम हो वहां आप जो भी करें वो नैतिक होता है।


Without love you cannot be moral

Really you have no love. You have pleasure, you have sensation, you have sexual attachments, such as the family, the wife, the husband, the attachment to a nation. But attachment is not love. And love is not something divine and profane: it has no division. Love means something to care for: to care for the tree, for your neighbour, for the child—to see that the child has the right education, not just put him in a school and disappear; the right education not just technological education—and to see that the children have the right teachers, right food, that they understand life, that they understand sex. Teaching children merely geography, mathematics, or a technical thing which will give them a job—that is not love. And without love you cannot be moral—you may be respectable; that is, you may conform to society; that you will not steal, that you will not chase your neighbour’s wife, that you will not do this and you will not do that. But that is not morality, that is not virtue, that is merely the conformity of respectability. Respectability is the most terrible, disgusting thing on earth, because it covers so many ugly things. Whereas when there is love, there is morality. Do what you will, it is moral, if there is love.
The Collected Works vol XIV, p 302


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