12 Dec 2009

जहां इच्छा हो, क्या वहां प्रेम के लिए कोई जगह बचती है?

हम अपनी इच्छाओं के लिए पागल हुए जाते हैं, हम अपने आपको इच्छा द्वारा तुष्ट करना चाहते हैं। लेकिन हम यह नहीं देखते कि वैयक्तिक सुरक्षितता की इच्छा, व्यक्तिगत उपलब्धि, सफलता, शक्ति, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा...आदि इन इच्छाओं ने इस संसार में क्या कहर बरपाया हुआ है। हमें यह अहसास तक नहीं है कि हम ही उस सब के जिम्मेदार हैं जो हम कर रहे हैं।  अगर कोई इच्छा को, उसकी प्रकृति को समझ जाये तो उस इच्छा का स्थान या मूल्य ही क्या है?  क्या वहां इच्छा का कोई स्थान है जहां प्रेम है? या जहां इच्छा हो, क्या वहां प्रेम के लिए कोई जगह बचती है?


Desire and love

We are all so crazy about desire, we want to fulfil ourselves through desire. But we do not see what havoc it creates in the world—the desire for individual security, for individual attainment, success, power, prestige. We do not feel that we are totally responsible for everything we do. If one understands desire, the nature of it, then what place has it? Has it any place where there is love?
The Network of Thought, p 49
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