31 Jul 2009

जब केवल निपट प्रेक्षण होता है तभी जागरूकता होती है।

आप जानते हैं एकाग्रता एक प्रयास है, किसी विशेष पृष्ठ, एक विचारधारा, छवि, चिन्ह आदि पर ध्यान केन्द्रित करना आदि। एकाग्रता अपवर्जना की एक प्रक्रिया है। एकाग्रता किसी चीज को वर्जित कर अन्य पर ध्यान केन्द्रित करना है। आप किसी छात्र से कहते हैं खिड़की के बाहर मत देखो, अपनी किताब पर ध्यान दो। तो वो बाहर देखना चाहता है, पर किताब पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए स्वयं को बाध्य करता है तो यहाँ एक द्वंद्व है। एकाग्रता का यह अविरत प्रयास, एक अपवर्जन (किसी चीज को वर्जित कर किसी अन्य में प्रवृत्त होना) प्रक्रिया है जिसका जागरूकता से कोई लेना देना नहीं है।
जब कोई प्रेक्षक होता है देखता है, यह आप भी कर सकते हैं, कोई भी कर सकता है। जब केवल चुनाव रहित प्रेक्षण होता है तो ही जागरूकता होती है। चुनाव सहित देखना, पूर्वाग्रह सहित देखना भ्रमित रहना और अ‘जागरूकता है।
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आप उसे ईष्र्या, क्रोध लोभ कहते हैं।

आप खुद पर ही यह प्रयोग कर के देखें। यह बहुत ही सामान्य और आसान है। अगली बार जब भी आप क्रोधित हों, ईष्र्या, लोभ, हिंसा या जो कुछ भी भाव हो....से भर जाएं स्वयं को देखें। उस दशा में ‘आप स्वयं’ नहीं होते। वह केवल निपट अस्तित्व की दशा होती है। उसके कुछ क्षणों बाद, कुछ सेकण्ड्स बाद आप अस्तित्व में आते हैं, आप उस दशा.. को नाम एक देते हैं या क्रोध, ईष्र्या, लोभ आदि कहते हैं। तो आप देखिये... आप तुरंत एक दृष्टा और एक दृश्य, एक अनुभव और एक अनुभोक्ता की रचना कर लेते हैं। जब अनुभोक्ता और अनुभव होता है तो अनुभोक्ता (अनुभव करने वाला) अनुभव में बदलाव की कोशिश करता है। तो इन सब बातों को याद रखें इस प्रकार हम खुद, अपने और अनुभव में अलगाव बनाये रखते हैं। यदि आप भावों का नामकरण नहीं करते हैं - जिसका मतलब है कि जब आप परिणाम की खोज में नहीं हैं, जब आप आलोचना नहीं कर रहे हैं, जब आप केवल चुपचाप अहसास को देख भर रहे हैं - तब आप पाएंगे इस अहसास की दशा में इस अनुभव की दशा में अनुभोक्ता और अनुभव कुछ नहीं होता। क्योंकि अनुभव और अनुभव करने वाला एक ही हैं। केवल अनुभविता ही है।
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इस बीच कोई भी अंतराल नहीं... दूरी नहीं - आरंभ और अंत एक ही हैं

अंर्तवलोकन, खुद को देखना आत्मोन्नति (खुद को सुधारने की कोशिश) का एक प्रकार है। यह आत्मप्रसार कभी भी सत्य तक नहीं पहुँचाता क्योंकि यह स्वयं को आबद्ध करने वाली एक प्रक्रिया है। जबकि जागरूकता वह दशा है जहां सत्य अस्तित्व में आता है, ‘जो है’ वह सत्य रूप में। रोजमर्रा के जीवन के सामान्य सच। जब हम रोजमर्रा के सामान्य सत्यों को समझने लगते हैं तभी हम उनके पार जा सकते हैं। आपको कहीं जाना है तो आप ‘जहाँ हैं’ वही से शुरूआत करनी होगी। लेकिन हम में से बहुत से लोग छलांग लगाना चाहते हैं। जो पास है, निकट ही है उसको बिना जाने समझे, हम दूर की बातें जानना समझना चाहते हैं। जब हम जो पास ही है निपट निकट ही है उसे समझ लेते हैं, तब हमें पता चलता है कि पास और दूर कोई अंतराल है ही नहीं। उनमें कोई अंतरात या दूरी है ही नहीं शुरूआत और अंत एक ही हैं।
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क्या कोशिश का मतलब बदलाव लाने के लिए किया गया वह संघर्ष नहीं है जो, ‘जो है’ उसे ‘जो नहीं है‘ या, जो होना चाहिए या जो होगा, उसमें बदलने के लिए। हम ‘जो है’, उसमें परिवर्तन अथवा बदलाव के लिए निरंतर पलायन करते/भागते रहते हैं। जब हम उस वास्तविकता से ‘जो है’, अ‘जागरूक होते हैं केवल उसी समय बदलाव की कोशिश पैदा होती है। तो कोशिश अ‘जागरूकता है। ‘जो है’ उसके अभिप्राय, उसके महत्व को जानना समझना जागरूकता है, और इस अभिप्राय/महत्व को पूर्णरूपेण स्वीकारना स्वतंत्रता लाता है। तो जागरूकता निष्प्रयास है। जागरूकता, ‘जो है’ उसे वैसा का वैसा बिना किसी विक्षेपण के देखना है। जहाँ भी कोशिश की जाती है प्रयास किया जाता है, वहाँ विक्षेपण होता है।
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