18 Feb 2010

जीवन का लक्ष्य


अब यह कुछ ऐसी वास्तविकता है जिसे मैं निश्चित होकर कह सकता हूं कि मैंने उपलब्ध किया है। मेरे लिये, यह कोई सैद्धांतिक संकल्पना नहीं है। यह मेरे जीवन का अनुभव है,.... सुनिश्चित, वास्तविक और ठोस। इसलिए मैं इसकी उपलब्धि के लिए क्या आवश्यक है, यह कह सकता हूं। और मैं कहता हूं कि पहली चीज यह है कि हम जो है उसे वैसा का वैसा ही पहचाने यानि अपनी पूर्णता में कोई इच्छा क्या हो जायेगी, और तब प्रत्येक क्षण के अवलोकन में स्वयं को अनुशासित करें, जैसे कोई अपनी इच्छाओं को खुद ही देखे, और उन्हें उस अवैयक्तिक प्रेम की ओर निर्दिष्ट करे, जो कि उसकी स्वयं की निष्पत्ति हो। जब अप निरंतर जागरूकता का अनुशासन स्थापित कर लेते हैं। उन सब चीजों का जो आप सोचते हैं, महसूस करते हैं और करते है (अमल में लाते हैं) का निरंतर अवलोकन हम में से अधिकतर के जीवन में उपस्थित दमन, ऊब, भ्रम से मुक्त कर , अवसरों की श्रंखला ले आता है जो हमें संपूर्णता की ओर प्रशस्त करती है। तो जीवन का लक्ष्य कुछ ऐसा नहीं जो कि बहुत दूर हो, जो कि दूर कहीं भविष्य में उपलब्ध करना है अपितु पल पल की, प्रत्येक क्षण की वास्तविकता, हर पल का यथार्थ जानने में है जो अभी अपनी अनन्तता सहित हमारे सामने साक्षात ही है।

The goal of life

Now this reality is something which I assert that I have attained. For me, it is not a theological concept. It is my own life-experience, definite, real, concrete. I can, therefore, speak of what is necessary for its achievement, and I say that the first thing is the recognizing exactly what desire must become in order to fulfil oneself, and then to discipline oneself so that at every moment, one is watching one's own desires, and guiding them towards that all-inclusiveness of impersonal love which must be their true consummation. When you have established the discipline of this constant awareness, this constant watchfulness upon all that you think and feel and do, then life ceases to be the tyrannical, tedious, confusing thing that it is for most of us, and becomes but a series of opportunities towards that perfect fulfillment. The goal of life is, therefore, not something far off, to be attained in the distant future, but it is to be realised moment by moment in that now which is all eternity.

Early Works, circa 1930

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