26 Nov 2009

हमारा जीवन Our Life






प्रश्न # किसी बात की सम्पूर्णता देखने से क्या आशय है? क्या यह कभी संभव है कि हम किसी गतिमान चलायमान चीज की सम्पूर्णता को महसूस कर सकें?


क्या आप इस प्रश्न को समझ रहे हैं? यह एक अच्छा प्रश्न है? तो क्या हम और आप मिलकर इस प्रश्न को बूझने की कोशिश करें?

जैसा कि हमने पहले प्रश्न की खोजबीन में कहा कि हमारी चेतना की सम्पूर्णता, जो चेतना ‘‘मैं’’ के रूप में केन्द्रीकृत है, स्व आत्म के रूप में, अहंवादी गतिविधि में, स्वकेन्द्रित कार्यव्यवहार में चलाय मान है, जो हमारी चेतना की सम्पूर्णता है। ठीक? अब क्या हमे इसे पूरी तरह से देख सकते है? बिल्कुल, हम देख सकते हैं। क्या यह कठिन है? तो बात ये है कि किसी की भी चेतना से ही उसके सभी पक्ष बनते हैं। ठीक? तो यह स्पष्ट हुआ?


तो मेरी ईर्ष्‍या मेरी राष्ट्रीयता, मेरे विश्वास मान्यताएं, मेरे अनुभव और इत्यादि आदि, यही उसके पक्ष या तत्व हैं जिसे चेतना कहते हैं।

इसके मूल में मैं हूं, आत्म हूं। ठीक? तो इस बात को अब पूरी तरह से देखते हैं। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? बिल्कुल, आप ऐसा कर सकते हैं। जिसका मतलब है कि उसे पूरी अवधानता या, होश से देखना।


पुनः हम कदाचित ही किसी बात पर पूरा ध्यान देते हैं। तो अब हम एक दूसरे से कह रहे हैं कि: इस पक्षों इन तत्वों पर पूर्ण ध्यान देते हुए देखें। इस आत्म पर, इस स्व या मैं पर जो कि इसका निचोड़ है, मूल है इसे अवधान पूर्वक देखें, तो आप सम्पूर्णत्व देख पायेंगे।

इसके साथ ही प्रश्नकर्ता ने यह भी कहा है कि, जो कि रूचिकर भी है कि क्या यह कभी संभव है कि किसी चलायमान चीज की सम्पूर्णता को जाना समझा, महसूस किया जा सकता है? तो क्या आपकी चेतना के तत्व चलायमान हैं? यह अपनी ही सीमाओं में चल रहे हैं।


देखिये, चेतना में क्या चलायमान है? मोह, जुड़ाव, किसी से न जुड़ने का भय, वह भय कि मैं किसी से न जुड़ा तो कया होगा? जो क्या है? अपनी ही परिधि में गतिविधि, अपने ही सीमित क्षेत्र में गतिमान रहना। जो आप देख ही रहे हैं, जिसका आप निरीक्षण कर रहे हैं। तो आप देख सकते हैं जो सीमित ही है। अगर हम इसमें और जरा गहरे जायें, तो चैंकियेगा मत। तो क्या हमारी चेतना ही अपने तत्वों के साथ जी रही है? क्या आप मेरे प्रश्न को समझे? क्या मेरे विचार, ख्याल ही जिन्दा हैं? आपकी मान्यताएं ही जी रही हैं? तो क्या जी रहा है? क्या आप इस सब को समझ बूझ रहे हैं? किसी ने अनुभव किया, खुशी, दुख, भला, बुरा, तथाकथित बुद्धत्व - आपके पास सत्य का अनुभव या बुद्धत्व का अनुभव नहीं है.... ये अप्रासंगिक है। तो क्या वह अनुभव है जो आप जी रहे हैं? या उस अनुभव की याद है जो आप जी रहे हैं? ठीक? तो याद, न कि तथ्य। तथ्य यथार्थ तो जा चुका है। लेकिन वो जो स्मृति की गतिविधि... यादों का चलना है उसे हम जीना कह रहे हैं। तो अनुभव जो चले गये हैं बीत चुके हैं, निश्चित ही वही याद किये जा रहे होते हैं, और इस याद करने को ही हम जिन्दगी जीना कह रहे हैं। यह आप देख सकते हैं, पर वो नहीं जो बीत ही चुका है। मुझे आश्चर्य होगा यदि आप यह देख पायें?

तो हम जिसे जीना कह रहे हैं वो, वो चीज है जो हो चुका है, जा चुका है। देखिये श्रीमन्, आप क्या कर रहे हैं। जो कि जा चुका है और मृत है, हमारा मन बहुत ही मरा हुआ है, और इस सब की यादों को हम जीवन कह रहे हैं। यह हमारे जीवन की त्रासदी है। मुझे वो दोस्त याद है जो मेरा हुआ करता था, जो चला गया है, भाई, बहन, पत्नी, स्‍वर्गवासी माँ, ये सब याद हैं। तो क्या यह यादें जो उनके चित्रों को देखने से मैं याद कर रहा हूं यही जीना है। क्या आप समझे श्रीमन्? और यही है जिसे हम जीना या जीवन कहते हैं।

QUESTION: What does it mean to see the totality of something?  Is it ever possible to perceive the totality of something which is moving?

You understand the question?  A good question?  Shall we do it together?

As we said in the previous question in going into it, to perceive the totality of our consciousness, that consciousness is centred as the 'me', the self, the egotistic activity, self-centred movement, which is the totality of our consciousness. 

Right?  Now can we see that completely?  Of course we can. Is that difficult?  That is, one's consciousness is made up of all its content.  Right?  Is that clear? 

That is, my jealousy, my nationality, my beliefs, my experiences and so on and so on and so on, that is the content of this thing called consciousness. 
The core of that is me, the self. Right?  To see this thing entirely now. Right, sir?  Can you do it?  Of course you can.  Which means giving complete attention to it. 
Again we rarely give complete attention to anything. Now we are asking each other: give complete attention to this content which is at the very core of the self.  The self, the 'me', is the essence of that, and give attention to it, and you see the whole, don't you?

Now the questioner says also, which is interesting, which is, is it ever possible to perceive the totality of something which is moving?  Is the self moving?  Is the content of your consciousness moving?  It is moving within the limits of itself.  Right sir?  Are you following all this?  Am I talking to myself?

Sir, look, what is moving in consciousness?  Attachment, the fear of not being attached, the fear of what might happen if I am not attached?  Which is what?  Moving within its own radius, within its own limited area.  That you can observe.  So you can observe that which is limited.  I want to go into this a little bit, don't be shocked.  Is our consciousness with its content living?  You understand my question?  Are my ideas living?  Your belief living? So what is living?  Are you following this?  One has an experience, pleasant, unpleasant, noble, ignoble, so-called enlightened - you cannot have experience of truth, of enlightenment - that's irrelevant.  So is the experience that you have had living?  Or the remembrance of that experience is living?  Right?  The remembrance, not the fact.  The fact has gone.  But the movement of remembrance is called what is living.  You follow?  Come on, sirs, move.  So the experience, which has gone, of course, that is remembered, that remembrance is called living.  That you can watch, but not that which is gone.  I wonder if you see this?
So what we call living is that which has happened and gone.  See, sir, what you are doing.  That which has gone and dead, our minds are so dead, and the remembrance of all that is called living.  That is the tragedy of our life.  I remember the friends we have had, they have gone, the brothers, the sisters, the wives that are dead, the mothers, I remember.  The remembrance is identified with the photograph and the constant looking at it, remembering it, is the living.  You understand, sir?  And that is what we call living.


Share/Bookmark