28 Jan 2010

स्‍वाधीनता दी नहीं जा सकती, स्‍वाधीनता भीख में नहीं मिलती



स्‍वाधीनता दी नहीं जा सकती, स्‍वाधीनता कुछ ऐसा है जो तब आती है जब आप उसे नहीं खोजते, यह तब अपने आप आती है जब आप जान जाते हैं कि आप कैदी हैं। जब आप अपने ही बारे में जानते हैं कि आप यंत्रबद्ध से हैं, जब आप जानते हैं कि आप समाज, संस्कृति, परंपराओं और वो सब जो आप कहते हैं, उनके द्वारा चलाये जा रहे हैं। स्‍वाधीनता एक सामान्यपन है यह असामान्य चीज नहीं है और यह प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्णतः, बाहरी और आंतरिक रूप से होनी ही चाहिये। बिना स्‍वाधीनता के आपकी दृष्टि में स्पष्टता नहीं होती। बिना स्‍वाधीनता के आप प्रेम नहीं कर सकते। बिना स्‍वाधीनता के आप सत्य की खोज नहीं कर सकते। बिना स्‍वाधीनता के आप मन की सीमाओं से पार नहीं पा सकते। आपको अपने पूरे अस्तित्व से इसकी अभीप्सा जगानी होगी। जब आप अपने से ही इसकी अत्यंतिक मांग उठायेंगे तब आप अपने में ही इसे पा सकेंगे और यह जान सकेंगे कि स्‍वाधीनता, सामान्यपन सहजपन क्या है? और नियत चिन्हों पर चलने, लकीरें पीटने से स्‍वाधीनता नहीं मिलती, ना ही यह आदतों का प्रतिफल होती है।

Freedom cannot be given

Freedom cannot be given; freedom is something that comes into being when you do not seek it; it comes into being only when you know you are a prisoner, when you know for yourself completely the state of being conditioned, when you know you are held by society, by culture, by tradition, held by whatever you have been told. Freedom is order - it is never disorder - and one must have freedom, completely, both outwardly and inwardly; without freedom there is no clarity; without freedom you can't love; without freedom you can't find truth; without freedom you can't go beyond the limitation of the mind. You must demand it with all your being. When you so demand it, you will find out for yourself what order is - and order is not the following of a pattern, a design; it is not the outcome of habit.
J. Krishnamurti, Bombay, India, January 1968 Collected Works. Vol. VIII 



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