8 Jan 2010

भलाई, प्यार और बुद्धिमानी



केवल एक ही बात मायने रखती है वो है -भलाई, प्रेम, बुद्धिमानी इत्यादि अमल में आये, कर्म भी हो। क्या भलाई वैयक्तिक और सामूहिक होती है?, क्या प्रेम वैयक्तिक और अवैयक्तिक होता है?, क्या बुद्धिमानी मेरी या तुम्हारी या और किसी की होती है? यदि यह मेरी या तुम्हारी है तो यह बुद्धिमानी या प्रेम या भलाई नहीं। यदि भलाई वैयक्तिक और सामूहिक रूप से किसी विशेष प्राथमिकता या निर्णय की तरह हो तो वह भलाई नहीं रह जायेगा। भलाई वैयक्तिक्ता या सामूहिकता के नाम पर घर के पिछवाड़े में फेंक देने जैसी चीज नहीं है, भलाई, वैयक्तिता या सामूहिकता, इन दोनों से स्वतंत्र रहकर फूलती-फलती है।

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