13 Jan 2010

वास्‍तव में जागरूकता है क्‍या ?



प्रश्न: आपने हमें बताया कि अपने दैनिक जीवन में गतिविधियों कार्यव्यवहार का अवलोकन करें लेकिन वह क्या या कौन सा अस्तित्व है जो यह तय करेगा कि किसका अवलोकन करना है और कब? कौन तय करेगा कि उसे अवलोकन करना चाहिये?
कृष्णमूर्ति: क्‍या आपने तय किया है कि अवलोकन करना है? या आप केवल अवलोकन कर रहे हैं? क्या आपने यह फैसला लिया, तय किया है और कहा है कि ”मैं अवलोकन करने और सीखने जा रहा हूँ?“ तब वहां प्रश्न हो सकता है कि कौन तय कर रहा है? तब वहां पर कहा ये जा रहा है कि ‘मैं जरूर करूंगा?’ और जब वह असफल रहता है, तब वह अपने आपको दंडात्मक भाषा में बार-बार कहता है -मैं करूंगा ही, मुझे करना ही है, तब वहां पर संघर्ष होता है तो मन-मस्तिष्क की वह अवस्था जब ‘‘अवलोकन करना’’ फैसला लिया जाकर, तय किया जाता है... वह कतई, कहीं से भी अवलोकन नहीं है। आप सड़क पर चले जा रहें है और आपके बगल से गुजरा आपने उसे देखा और और खुद से कहा - कैसा गंदा है वह, कैसी बदबू मार रहा है, मैं कामना करता हूं कि वह ऐसा और वैसा ना हो। जब आप अपने बगल से गुजरने वाले पर अपनी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहते हैं, जब आप इस बात के प्रति जागरूक रहते हैं कि आप कोई फैसला दे रहें हैं, आलोचना कर रहें या किसी चीज को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहें हैं - तब आप अवलोकन कर रहे हैं। तब आप यह नहीं कहते कि मुझे फैसला नहीं करना है, मुझे न्यायोचित नहीं ठहराना है। जब कोई आपकी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक होता है तब किसी तरह का निर्णय नहीं होता। आपने देखा होगा किसी ने कल आपकी बेइज्जती की... तुरन्त आपकी मांसपेशियां फड़कने लगती हैं, आप असहज और गुस्सा हो सकते हैं, आप उसे नापसंद करना शुरू कर देते हैं; तो उस नापसंदगी के प्रति जागरूक रहना है, उन सारी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहें, यह फैसला ना करें कि आपको अवलोकन करना है। अवलोकन करें, उस अवलोकन में कोई भी अवलोकनकर्ता नहीं होता, ना ही ‘अवलोक्य’ यानि ‘देखने वाला‘ और ‘देखा जा रहा’ अलग नहीं होते, तब केवल अवलोकन मात्र ही होता है। अवलोकनकर्ता तब पैदा होता है, जब आप अवलोकन में हेर-फेर या जोड़ना घटाना शुरू करते हैं। देखे गये को इकट्ठा कर उस पर नियंत्रण या कब्जा करने की कोशिश करते हैं। जब आप कहते हैं, वह मेरा मित्र है क्योंकि वह मुझे प्रसन्न करता है या वह मेरा मित्र नहीं है क्योंकि उसने मेरे बारे में बुरा गंदा कहा, या आपके बारे में कुछ सच ही कहा जो आप पसंद नहीं करते। तो अवलोकन को जमा, इकट्ठा या संग्रह करने वाला उसमें हेर फेर की गुंजाइश रखने वाला ही अवलोकनकर्ता है। जब आप बिना संग्रह करने या बिना हेर-फेर की इच्छा के अवलोकन करते हैं, तब कोई भी फैसला या निर्णय नहीं करते। आप सारा समय यही करते हैं इस अवलोकन में निसर्गतः प्राकृतिक रूप से विशेष निश्चित निर्णय प्राकृतिक परिणाम के रूप में आतें हैं पर यह वह निर्णय नहीं होते जो अवलोकनकर्ता, अवलोक्य या अवलोकन को इकट्ठा, जमा या संग्रह कर उन पर नियंत्रण या कब्जा कर, या उनमें हेर-फेर कर करता है।

Q:You tell us to observe our actions in daily life but what is the entity that decides what to observe and when? Who decides if one should observe?
Krishnamurti: 
Do you decide to observe? Or do you merely observe? Do you decide and say, `I am going to observe and learn'? For then there is the question: `Who is deciding?' Is it will that says, `I must'? And when it fails, it chastises itself further and says, `I must, must, must; in that there is conflict; therefore the state of mind that has decided to observe is not observation at all. You are walking down the road, somebody passes you by, you observe and you may say to yourself, `How ugly he is; how he smells; I wish he would not do this or that'. You are aware of your responses to that passer-by, you are aware that you are judging, condemning or justifying; you are observing. You do not say, `I must not judge, I must not justify'. In being aware of your responses, there is no decision at all. You see somebody who insulted you yesterday. Immediately all your hackles are up, you become nervous or anxious, you begin to dislike; be aware of your dislike, be aware of all that, do not `decide' to be aware. Observe, and in that observation there is neither the `observer' nor the `observed' - there is only observation taking place. The `observer' exists only when you accumulate in the observation; when you say, `He is my friend because he has flattered me', or, `He is not my friend, because he has said something ugly about me, or something true which I do not like,. That is accumulation through observation and that accumulation is the observer. When you observe without accumulation, then there is no judgement. You can do this all the time; in that observation naturally certain definite decisions are natural results, not decisions made by the observer who has accumulated.

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