8 Dec 2009

कामना की आग




ऐसा क्यों है कि सभी धर्म, सारे तथाकथित धार्मिक लोग इच्छाओं का दमन करते हैं? सारी दुनियाँ में, साधु, सन्यासी, इच्छाओं को इन्कार करते हैं इसके बावजूद कि वो उनके भीतर भी उबल रही होती हैं। कामनाओं की अग्नि जल रही होती पर वे उसका दमन कर या उस इच्छा को किसी चिन्हं से सम्बद्ध कर.. मान्य कर या किसी व्यक्ति अथवा छवि, छवि को अपनी इच्छाएं समर्पित कर.... इन्कार करते हैं। लेकिन इसके बावजूद वह इच्छाएं बनी रहती हैं।
हम में से बहुत से लोग, जब तक कि हम अपनी इच्छाओं के प्रति जागरूक हों, या इनको तृप्त करें या द्वंद्व में पड़ जायें यह संघर्ष चलता ही रहता है। यहां हम न तो इनके दमन की वकालत कर रहे हैं, ना इनके सामने समर्पण करने की ना ही इनका नियंत्रण करने की। क्योंकि यह सब तो सारी दुनियां में हर एक धार्मिक व्यक्ति द्वारा किया ही जा रहा है।
हमें इन्हें बहुत ही सूक्ष्मता और पास से देखना होगा ताकि इनके सम्बन्ध में हमारी अपनी एक समझ बनें। यह कैसे उगती हैं, इनकी प्रकृति आदि इस प्रकार की समझ बनने के उपरांत इनके बारे में एक सहज आत्म जागरूकता रहे, ताकि कोई बुद्धिमानी प्रकट हो। केवल तब ही सारे संव्यवहार बुद्धिमत्ता पूर्ण सम्पन्न हो सकेंगे ना कि इच्छाएं।

The fire of desire is burning
Why is it that all religions, all so-called religious people, have suppressed desire? All over the world, the monks, the sannyasis, have denied desire, though they are boiling inside. The fire of desire is burning, but they deny it by suppressing it or identifying that desire with a symbol, with a figure and surrendering that desire to the figure, to that person. But it is still desire. Most of us, when we become aware of our desires, either suppress or indulge it or come into conflict; the battle goes on. We are not advocating either to suppress it or to surrender to it or to control it. That has been done all over the world by every religious person. We are examining it very closely so that out of your own understanding of that desire, how it arises, its nature, out of that understanding, self-awareness of it, one becomes intelligent. Then that intelligence acts, not desire.
Mind Without Measure, p 18


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