10 Jun 2015

ध्यान, ज्ञान-विवेक का प्रारंभ है

जो अज्ञेय है उसे ग्रहण करने, उसे आत्मसात करने के लिए मन को भी ज्ञान रहित, ज्ञात रहित होना होगा। मन विचार प्रक्रिया का परिणाम है, काल का परिणाम है और इस विचार प्रक्रिया का अंत होना चाहिए, अंत पर आना चाहिए। मन उसके बारे में नहीं सोच सकता जो कि अनादि, शाश्वत या कालातीत है इसलिए मन को अपरिहार्यतः काल से मुक्त होना चाहिए, मन में चलने वाली काल प्रक्रिया खत्म होनी चाहिए। केवल तब, जब मन बीते कल से पूरी तरह मुक्त हो, और आज को किसी आने वाले कल के लिए इस्तेमाल ना कर रहा हो, तब ही मन अनादि, अनन्त को ग्रहण करने में सक्षम होता है। वह जो ज्ञात है उसका अज्ञात से कोई संबंध नहीं होता, इसलिए आप अज्ञात अज्ञेय से प्रार्थना नहीं कर सकते, आप अज्ञेय पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकते, अज्ञेय के प्रति समर्पित नहीं हो सकते. इन सब का कोई अर्थ नहीं होता। महत्वपूर्ण और सार्थक है यह देखना जानना कि हमारा मन किस तरह संचालित होता है, और यह ऐसे जाना जा सकता है कि हम अपनी ही गतिविधियों को, कर्मों को देखें।

इसलिए हमारा ध्यान से सरोकार है कि कोई अपने ही बारे में जान समझ सके, मन के ऊपरी सतही तल पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण आंतरिक अस्तित्व, गुप्त-सुप्त चेतना के स्वरूप को समझना। इस सबको समझे जाने बिना, और मन को ढर्राबद्धता यांत्रिकता से मुक्त किये बिना आप मन की सीमाओं के पार नहीं जा सकते।
बस इसलिए ही जरूरी है कि विचार प्रक्रिया समापन पर आये, रूके ठहरे और इस अंत ठहराव के लिए जरूरी है कि हमें अपने ही स्वरूप का ज्ञान हो। ध्यान, ज्ञान-विवेक का प्रारंभ है, जो कि अपने ही दिल दिमाग को जानना समझना भी है।

The mind itself must become the unknown

    To receive the unknown, the mind itself must become the unknown. The mind is the result of the thought process, the result of time, and this thought process must come to an end. The mind cannot think of that which is eternal, timeless; therefore, the mind must be free of time, the time process of the mind must be dissolved. Only when the mind is completely free from yesterday, and is therefore not using the present as a means to the future, is it capable of receiving the eternal. That which is known has no relationship with the unknown; therefore, you cannot pray to the unknown, you cannot concentrate on the unknown, you cannot be devoted to the unknown. All that has no meaning. What has meaning is to find out how the mind operates, it is to see yourself in action.
    Therefore, our concern in meditation is to know oneself not only superficially, but the whole content of the inner, hidden consciousness. Without knowing all that and being free of its conditioning, you cannot possibly go beyond the mind's limits. That is why the thought process must cease and, for this cessation, there must be knowledge of oneself. Therefore, meditation is the beginning of wisdom, which is the understanding of one's own mind and heart.

Collected Works, Vol. V,165


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