29 Dec 2008

ध्यान

ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना है।

एक निःश्छल, निस्वार्थ दिल का होना ध्यान का आरंभ है। जब हम उस के बारे में बात करना चाहते हैं तो मन मस्तिष्क के अंतस्तल की कोशिशों की आवश्यकता होगी। हमें पहला कदम उसके सबसे निकट के बिंदु से उठाना होगा। ध्यान का फल है शुभता और निश्छल ह्दय ध्यान का आरंभ है। हम जीवन की बहुत सी चीजों के बारे में बात करते हैं। प्रभुता, महत्वाकांक्षा, भय, लोभ, ईष्र्या, मृत्यु के संबंध में बहुत सी बातें करते हैं। अगर आप देखें तो, अगर आप इनके भीतर तक जाएं तो, यदि आप ध्यानपूर्वक सुने तो ये सारी बातें एक ऐसे मन को खड़ा करने का आधार हैं जो ध्यान में सक्षम हो। आप ध्यान के शब्द से खेल सकते हैं - ध्यान नहीं कर सकते यदि आप महत्वाकांक्षी हों। यदि आपका मन प्रभुत्व का आकांक्षी है, संस्कारों में बंधा है, स्वीकार और अनुसरण में लगा है तो आप ध्यान की खूबसूरती का अतिरेक नहीं देख सकतेे।
समयबद्ध रूप से इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिशें, मन की निश्छलता को, निस्वार्थ भाव को खत्म करती हैं। और आपको चाहिए एक निश्छल मन - एक खुला ह्दय, जो आकाश की तरह खाली हो। एक दिल जो बिना विचारे, निरूद्देश्य देना चाहता हो बिना किसी प्रतिफल की आशा के। क्षुद्रतम से लेकर जितना भी उसके पास हो उसे देने की त्वरितता, बिना किसी असमंजस, भले बुरे की परवाह बगैर, मानरहित..... किसी ऊंचाईयां की तलाश की कोशिश बगैर, बिना प्रसिद्धि की लालसा में। ऐसे उर्वर मन की भूमि पर ही शुभता फूलती फलती है। और ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।
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ध्यान, जीवन की महानतम कला है और इसका सौन्दर्य इसमें भी है कि इसे किसी अन्य से सीखना संभव नहीं। इसकी कोई तकनीक नहीं और इसलिए इस पर कोई आधिपत्य भी नहीं।
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क्या सत्य कुछ निर्णायक, चरम और स्थिर-सी जड़ चीज है? या हम चाहते हैं कि सत्य कुछ निर्णायक सी, चरम और स्थिर-जड़-सी चीज हो ताकि हमें उसके नीचे आसरा मिल सके। हम चाहते हैं कि वो चिरस्थायी हो ताकि हम उसे पकड़ सकें, उसमें खुशियां ढूंढ सकें। पर क्या सत्य पूरी तरह, निरंतर, कितनी बार भी अनुभव किये जाने पर भी वैसा का वैसा रहने वाली चीज है? अनुभवों का दोहराव, स्मृतियों का संचयन है, ऐसा नहीं है क्या? मौन के क्षणों में, मैं एक सत्य अनुभव करता हूं, पर यदि मैं इसे स्मृति और अनुभव के रूप में पूर्ण और निरपेक्ष स्थिर कर दूं तो क्या वह सत्य रहेगा? क्या सत्य सततता है, स्मृति की उपज है? या सत्य केवल तब मिलता है जब मन नितांत स्थिर होता है? जब मन स्मृतियों की जकड़ से परे होता है, स्मृतियों की उपज के रूप में पहचान का कोई केन्द्र नहीं होता, पर सब कुछ के प्रति एक होश या चेतना भर होती है। जो मैं कह रहा हूं, जो कुछ भी अपने संबंधों में मैं कर रहा हूं, मेरी गतिविधियों में, सब कुछ के सत्य को प्रतिक्षण देखते हुए, जैसा वो है - निश्चित ही यही ध्यान का ढंग है, क्या नहीं? जब मन ठहरा हुआ हो तब एक बोध मात्र होता है। यह बोध मात्र मन का ठहराव तब तक नहीं होता जब तक खुद से बेपरवाही... एक उन्मनापन नहीं होता। और यह उन्मनापन किसी भी प्रकार के अनुशासन, किसी भी संप्रभुता के अनुशीलन वो प्राचीन हो या आधुनिक से उपलब्ध नहीं होता। विश्वास प्रतिरोध, अलगाव पैदा करता है और जहां अलगाव हो वहां प्रशांतधीरता की संभावना नहीं रहती। यह धीरता स्वयं को पूर्ण रूप से समझने, अपने ‘मैं’ जो कि कई द्वंद्वों के अस्तित्व से मिलकर खड़ा हुआ है को समझने के बाद ही आती है। यह एक कठिन कार्य है तो हम कई अन्य जुगाड़ों करामातों की ओर मुड़ जाते हैं जिन्हें हम ध्यान का नाम देते हैं। मन की यह चालाकियां ध्यान नहीं हैं। ध्यान आत्मज्ञान का आरंभ है और ध्यान के बिना कोई आत्मज्ञान नहीं।

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