29 Dec 2008

इस दुनियां में क्या हो रहा है? आपका ईश्वर ईसाई है, हिन्दू है, मुसलमान है। सबकी अपनी अपनी कल्पना के हिसाब से ईश्वर है और उसमें भी छोटे से छोटे अन्तर विशेष से सत्य का आग्रह करते हुए। कुछ लोगों के हाथों में ये विशेष सत्य शोषण का माध्यम, धर्म की दुकान बन जाता है। आप बारी बारी से हर दुकान पर जाते हैं, सब जांचते हैं, क्योंकि आप भला-बुरा देखने की समझ खोने के कगार पर हैं। क्योंकि आप बीमार हैं और आप इलाज चाहते हैं और आप किसी भी दुकान द्वारा पेश किये गये इलाज को स्वीकार करने के लिए खुद को मजबूर पा रहे हैं वो हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या और कोई। तो होता ये है कि आपका भगवान आप लोगों को बांट देता है, आपका ईश्वर में विश्वास आपको इंसानों-इंसानो में बांट दे रहा है कुछ आदमी हिन्दू, कुछ ईसाई, कुछ सिख। इसके बावजूद आप ईश्वर के नाम पर भाईचारे की बात करते हैं मुसलमान मुसलमान एक अल्लाह के बंदे हैं हिन्दुओं, ईसाइयों, पारसियों का क्या? आप जो खोजने चलें हैं आप शुरू में ही उससे इंकार कर देते हैं, क्यांेकि आप अपने विश्वासों से बंधे हुए हैं, विश्वासों की सूली पर टंगे हुए हैं क्योंकि आप मानते हैं कि विश्वास सीमाओं को ढहाने वाला सशक्त जरिया है चाहे वो कहीं भी हो आप उसी पर जोर देते हैं। यही बातें सब तरफ देखी जा रही हैं।
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धर्म, जैसा की हम सामान्य तौर पर जानते हैं या मानते हैं, मतों - मान्यताओं, रीति रिवाजों परंपराओं, अंधविश्वासों, आदर्शों के पूजन की एक श्रंखला है। आपको आपके हिसाब से तय अंतिम सत्य को ले जाने के लिए मार्गदर्शक गुरूओं के आकर्षण। अंतिम सत्य आपका प्रक्षेपण है, जो कि आप चाहते हैं, जो आपको खुश करता है, जो आपको मृत्यु रहित अवस्था की निश्चितता देता है। तो इन सभी में जकड़ा मन एक धर्म को जन्म देता है, मत-सिद्धांतों का धर्म, पुजारियों द्वारा बनाया गया धर्म, अंधविश्वासों और आदर्शों की पूजा। इन सबमें मन जकड़ जाता है, दिमाग जड़ हो जाता है। क्या यही धर्म है? क्या धर्म केवल विश्वासों की बात है, क्या अन्य लोगों के अनुभवों, ज्ञान, निश्चयों का संग्रह धर्म है? या धर्म केवल नैतिकता भलमनसाहत का अनुसरण करना है? आप जानते हैं कि नैतिकता भलमनसाहत, आचरण से तुलनात्मक रूप से सरल है। आचरण में करना आ जाता है ये करें या न करें, चालाकी आ जाती है। क्योंकि आचरण सरल है इसलिए आप आसानी से एक आचरण पद्धति का अनुसरण कर सकते हैं। नैतिकता के पीछे घात लगाये बैठा स्वार्थ अहं पुष्ट होता रहता है, बढ़ता रहता है, खूंखार रूप से दमन करता हुआ, अपना विस्तार करता रहता है। तो क्या यह धर्म है।

आपको ही खोजना होगा कि सत्य क्या है क्योंकि यही बात है जो महत्व की है। आप अमीर हैं या गरीब, आप खुशहाल वैवाहिक जीवन बिता रहें हैं और आपके बच्चे हैं, ये सब बातें अपने अंजाम पर पहुंचती है, जहां हमेशा मृत्यु हैं। तो विश्वास, अपने मत के किसी भी रूप, पूर्वाग्रह रहित होकर आपको सत्य को जानना होगा। आपको खुद अपने लिए ओज और तेज सहित, खुद पर अवलम्बित हो पहल करनी होगी कि सत्य क्या है?, भगवान क्या है?। मत और आपका विश्वास आपको कुछ नहीं देगा, विश्वास केवल भ्रष्ट करता है, जकड़ता है, अंधेरे में ले जाता है। खुद ही ओज और तेज सहित उठ पहल करने पर ही आत्मनिर्भर, मुक्त हुआ जा सकता है।
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