24 Aug 2009

विचार के हर क्षण में एक निर्बाध जिज्ञासा


अपनेआप को जानने के लिए अमित अन्वेषण, अत्यंत श्रम की आवश्यकता है। उतनी मेहनत से भी ज्यादा जो आप जीवननिर्वाह के लिए करते हैं, जो दिनचर्या मात्र है। यहाँ विचार के प्रत्येक क्षण में अद्भुत जागरूकता और सतत प्रेक्षण की माँग होती है।

जिस क्षण से आप विचार प्रक्रिया में जिज्ञासा प्रारंभ करते हैं, जिसमें प्रत्येक विचार को अलग करना और उसके बारे में अंत तक सोचना है, तब आप जानते हैं कि यह कितना कठिन है। यह एक आलसी आदमी का आनन्द नहीं है। यह करना आवश्यक है क्योंकि यह केवल मन ही है जो स्वयं को पुरानी स्मृतियों, पुरानी विचलितताओं, उलझनों, परस्पर-आत्म-विरोध से खुद को रिक्त कर सकता है। और यह मन ही है जो यथार्थ के सृजनात्मक संवेग के साथ नयापन लिये रहता है, तब मन खुद ही कर्मों का सृजन करता है जो उसके अस्तित्व को अनूठे आयाम के साथ समग्रता से संबंधित करता है। इसके बिना किसी भी तरह के सामाजिक सुधार या पुर्ननिर्माण, जो कितने ही जरूरी हों, कितने ही लाभदायक हों किसी भी तरह शांत और खुशहाल विश्व नहीं दे सकते।


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