29 Aug 2009

जब हम अपने बारे में जागरूक रहते हैं तो सारा जीवन मैं, अहं, स्व को उघाड़ने का जरिया बन जाता है। यह स्व एक जटिल प्रक्रिया है जो केवल सम्बन्धों में, हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों, जिस तरह हम बातचीत करते हैं, जिस तरह हम कोई फैसला लेते हैं, हिसाब-किताब करते हैं, जिस तरह हम अपनी और अन्य लोगों की आलोचना करते हैं - इन सब चीजों के बारे में जागरूकतापूर्वक देखने से मैं का सत्य उद्घाटित-अनावरित होता है।
इस सबसे हमारी अपनी विचारधारा की बंधी-बंधाई दशाएं अनावृत होती हैं, तो क्या यह बहुत जरूरी नहीं है कि हम इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जागरूक रहें।
पल-दर-पल सत्य क्या है इसकी जागरूकता से उस समयातीत, आत्म की खोज की जा सकती है। आत्मज्ञान के बिना आपका अंतःकरण, आत्म कुछ भी नहीं। जब हम अपने आपको नहीं जानते तब तक ‘आत्मा’, ‘अन्तःकरण’ शब्दमात्र होते हैं। ये एक इशारा, आश्चर्य, एक पाखण्ड, एक विश्वास और एक भ्रम होता है जिसमें मन पलायन कर सकता है। जब कोई ‘मैं’ को समझना शुरू करता है, जब कोई अपनी दिन-प्रति-दिन की सारी भिन्न-भिन्न गतिविधियों को देखता-समझता है, उनके प्रति जागरूक रहना आरंभ करता है तो इस समझ में अनायास ही उस नामातीत, समयातीत का अभ्युदय होता है, अस्तित्व में आता है। पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि वो नामातीत आत्मज्ञान की परिलब्धि होता है। नामातीत आत्मज्ञान की परिलब्धि नहीं है। उसके बाद अंतःकरण में ‘स्व’ नहीं दिखता, मन मस्तिष्क उसे नहीं पा सकते। वह तभी अस्तित्व में होता है जब मन शांत होता है। (कुछ लोग किसी की मृत्यु पर भी कहते हैं कि ‘‘वो शांत हो गया’’ ) मन के शांत, होने पर वह अस्तित्व में होता है। मन जब सहज रहता है, भंडारगृह की तरह अनुभवों, स्मृतियों के संचय, मूल्यांकन करने में नहीं लगा होता, तब वह सहज मन उस पूर्ण यथार्थ को समझ पाता है, वह मन नहीं जो मात्र शब्दों, ज्ञान, सूचनाओं से भरा हुआ हो।
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