31 Aug 2009

आत्मज्ञान एक प्रक्रिया नहीं जिसके बारे में पढ़ा जाए या कल्पना की जाए। प्रत्येक व्यक्ति को अत्यधिक सजग होकर, खुद की ही क्षण-प्रति-क्षण की गतिविधियों में इसकी खोज करनी पड़ती है।
इस सजगता में एक ‘कुछ होने’ या ‘ना होने’ की इच्छारहित, एक विशेष विश्रांति, एक सकारात्मक जागरूकता होती है जिसमें मुक्ति की एक आश्चर्यजनक भावना चेतना में आती है।
यह अहसास केवल मिनिट भर के लिए, या केवल सेकंड भर के लिये ही हो सकता है पर काफी होता है। यह मुक्ति की भावना स्मृति से नहीं आती, यह एक जीवंत चीज है। लेकिन मन इसका स्वाद लेना चाहता है, इसका स्मृति में संचय करना, और बार-बार अधिक मात्रा में चाहता है।
इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जागरूकता केवल आत्मज्ञान द्वारा ही संभव है। आत्मज्ञान आता है हमारे जीवन के क्षण-प्रति-क्षण को गहराई से देखने से - कि कैसे हम बोलते हैं, हमारे हावभाव, जिस तरह हम वातार्लाप करते हैं। इन सब चीजों को देखने से, अचानक इनके पीछे छिपे आशयों का ज्ञान होता है।
इसके बाद ही भय से मुक्त हुआ जा सकता है। जब तक भय है तब तक प्रेम नहीं हो सकता। भय हमारे जीवन को कलुषता से भर देता है, यह कलुषता किसी भी प्रार्थना, किसी भी आदर्श या गतिविधि से नहीं मिटाई जा सकती। इस भय का कारण ‘मैं’ ‘अहं’ का होना है। यह ‘मैं’ अपनी इच्छाओं, माँगों, लक्ष्यों सहित बहुत ही जटिल है।
हमारे मन को इस सारी प्रक्रिया को समझना है और यह समझ चुनावरहित चौकन्‍नेपन(जागरूकता) से आती है।
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