27 Jan 2010

आश्रम और समुदाय स्थापित करने का गोरखधंधा



श्रीमन प्रतिभा और गूढ़ता हमेशा ही आवरण में सहेजने चाहिये, क्योंकि इनको ज्यादा उघाड़ना केवल अन्धेपन का कारण ही बनता है। इसलिए मेरा यह मन्तव्य कभी भी नहीं रहता कि मैं लोगों को अन्धा करूं या अपनी प्रवीणता का प्रदर्शन करूं, यह निहायत ही मूर्खतापूर्ण है। लेकिन जब कोई चीजों को बहुत ही साफ साफ देखता है तो वह उन्हें अपने से परे रखने में सहायता नहीं पाता। इन्हें ही आप प्रतिभा और गूढ़ता के रूप में सोचते हैं।  मेरे लिये, मैं जो भी कह रह हूं, वह प्रतिभापूर्ण नहीं है, ऐसा सहज निश्चित है। यह एक तथ्य है। एक और बात, आप चाहते हैं कि मैं एक आश्रम या समुदाय की स्थापित करूं। अब बतायें, क्यों? आप मुझसे ये क्यों चाहते हैं कि एक समुदाय की स्थापना करूं? आप कह रहे हैं कि वह एक सन्दर्भ या पहचान के रूप में कार्य करेगा, या वो कुछ एक सफल प्रयोग के रूप में रखा या दिखाया जा सकेगा... यही तो है सन्दर्भ या पहचान का तात्पर्य ...क्या ऐसा ही नहीं है? एक समुदाय जहां इसी तरह की सारी चीजें चलायी जायेंगी। यही है जो आप चाहते हैं। मैं नहीं चाहता कि किसी आश्रम या समुदाय की स्थापना हो, आप चाहते हैं। अब, आप क्यों इस तरह के समुदाय की मांग कर रहे हैं? मैं आपको बताता हूं कि क्यों? यह बहुत ही रूचिकर है, नहीं? आप ऐसा इसलिए चाहते हैं कि आप अन्य लोगों के साथ उससे जुड़ना चाहते हैं और एक समुदाय गढ़ना चाहते हैं, लेकिन आप अपने ही साथ एक समुदाय आरंभ करना नहीं चाहते, आप चाहते हैं कि कोई अन्य ऐसा करे, और जब कोई समुदाय की स्थापना कर दे तब आप उसे ज्वाइन कर लें। दूसरे शब्दों में श्रीमन आप अपना ही समुदाय आरंभ करने से घबराते हैं इसलिए एक सन्दर्भ रूप में कोई आश्रम या समुदाय चाहते हैं। यही है, आप चाहते हैं कि कोई आपको किसी तरह की जिम्मेदारी या दायित्व दे, संस्थापित करे और आप उसे प्रभुतापूर्वक सहेजे सम्हालें, चलायें। अन्य शब्दों में आप अपने आप में आत्मविश्वस्त नहीं हैं इसलिए आप चाहते हैं कि किसी समुदाय की स्थापना हो और आप उसे ज्वाइन कर लें। श्रीमन, आप जहां भी हैं आप वहीं एक समुदाय पा सकते हैं, लेकिन वह समुदाय आप तभी पा सकते हैं जब आपमें आत्मविश्वास हो। समस्या यह है कि आपमें आत्मविश्वास ही नहीं है। आपमें आत्मविश्वास क्यों नहीं है? मेरा आत्मविश्वास का अभिप्राय क्या है? एक व्यक्ति जो कोई परिणाम को उपलब्ध करना चाहता है, वह वो सब प्राप्त करता है जो वह पाना चाहता है। एक व्यापारी, एक वकील, एक पुलिसिया, जनरल ये लोग आत्मविश्वास से भरे हैं, आत्मविश्वास से पूर्ण होते हैं। लेकिन यहीं आप में आत्मविश्वास नहीं है क्यों? एक साधारण सा कारण है कि आपने प्रयोग नहीं किया है, आपने जो भी समझा है उसे व्यवहार में नहीं लायें हैं। जब आप इसे प्रयोग में लायेंगे तब आपके पास आत्मविश्वास होगा। दुनिया में कोई भी व्यक्ति आपको आत्मविश्वास नहीं दे सकता, न कोई किताब, ना कोई शिक्षक आपको आत्मविश्वास से नहीं भर सकते। प्रोत्साहन आत्मविश्वास नहीं होता। प्रोत्साहन अत्यंत सतही, बचकाना, अपरिपक्व चीज है। आत्मविश्वास आता है जब आप प्रयोग में उतरते हैं। जब आप राष्ट्रीयता से प्रयोग में उतरते हैं.. तो देखिये। बुद्धि तो बहुत ही छोटी सी चीज है, तो जब भी आप प्रयोग में हो, व्यावहारिक हों .... आपमें आत्मविश्वास होता है क्योंकि आपका मन तेज द्रुतगामी और लचीला होता है तब आप जहां भी होंगे वहीं आश्रम होगा, आप अपनेआप ही एक समुदाय की स्थापना कर सकेंगे। यह स्पष्ट है, क्या नहीं? आप किसी भी समुदाय से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि आप किसी समुदाय की सदस्यता ग्रहण करें तो आप वही रहेंगे जो कि आप हैं - कोई आपका वरिष्ठ होगा, आपके लिए नियम कायदे कानून होंगे, अनुशासन होंगे, आप उस बेकार के समुदाय में वही कोई श्री राम या श्री राव होंगे। आप किसी समुदाय की आकांक्षा तभी करते हैं जब आप चाहते हैं कि आपको कोई निर्देशित करे, आपको बताये कि आपको क्या करना है। एक आदमी जो अपने आपको निर्देशित हुए देखना चाहता है वह अपनी आत्मविश्वासहीनता को जानता है। आप आत्मविश्वास पा सकते हैं पर आत्म विश्वास संबंधी बातें करके ही नहीं अपितु जब आप प्रयोग में उतरेंगे तब, आप कब कोशिश करेंगे श्रीमन। केवल आप ही हैं जो सन्दर्भ हो सकते हैं ना कि कोई समुदाय या आश्रम। और जब कोई समुदाय या आश्रम आपकी पहचान बने आप अपने आप को खो देते हैं। मुझे आशा करता हूं कि बहुत से लोग आपस में जुड़े और प्रयोग करें, आत्मविश्वास से भरें इसलिए इस कार्य में इकट्ठा आयें लेकिन वे लोग जो बाहर ही रहना चाहते हैं और कहते हैं "मैं सदस्यता ग्रहण करना चाहता हूं इसलिए आप कोई समुदाय क्यों नहीं स्थापित करते," यह निहायत ही मूर्खतापूर्ण प्रश्न करने वाले हैं।


Why do you want me to found a community?

Question:
Instead of addressing heterogeneous crowds in many places and dazzling and confounding them with your brilliance and subtlety, why do you not start a community or colony and create a reference for your way of thinking? Are you afraid that this could never be done?
Krishnamurti:
Sir brilliance and subtlety should always be kept under cover, because too much exposure of brilliance only blinds. It is not my intention to blind or show cleverness, that is too stupid; but when one sees things very clearly, one cannot help setting them out very clearly. This you may think brilliant and subtle. To me, what I am saying is not brilliant: it is the obvious. That is one fact. The other is, you want me to found an ashram or a community. Now, why? Why do you want me to found a community? You say that it will act as a reference, that is, something which can be pointed out as a successful experiment. That is what a reference implies, does it not? - a community where all these things are being carried out. That is what you want. I do not want to found an ashram or a community, but you want it. Now, why do you want such a community? I will tell you why. It is very interesting, is it not? You want it because you would like to join with others and create a community, but you do not want to start a community with yourself; you want somebody else to do it, and when it is done you will join it. In other words, Sir, you are afraid of starting on your own, therefore you want a reference. That is, you want something which will give you authority of a kind that can be carried out. In other words, you yourself are not confident, and therefore you say, `Found a community and I will join it'. Sir, where you are you can found a community, but you can found that community only when you have confidence. The trouble is that you have no confidence. Why are you not confident? What do I mean by confidence? The man who wants to achieve a result, who gets what he wants, is full of confidence the business man, the lawyer, the policeman, the general, are all full of confidence. Now, here you have no confidence. Why? For the simple reason you have not experimented. The moment you experiment with this, you will have confidence. Nobody else can give you confidence; no book, no teacher can give you confidence. Encouragement is not confidence; encouragement is merely superficial, childish, immature. Confidence comes as you experiment; and when you experiment with nationalism, wit even the smallest thing, then as you experiment you will have confidence, because your mind will be swift, pliable; and then where you are there will be an ashram, you yourself will found the community. That is clear, is it not? You are more important than any community. If you join a community, you will be as you are - you will have somebody to boss you, you will have laws, regulations and discipline, you will be another Mr. Smith or Mr. Rao in that beastly community. You want a community only when you want to be directed, to be told what to do. A man who wants to be directed is aware of his lack of confidence in himself. You can have confidence, not by talking about self-confidence, but only when you experiment, when you try. Sir, the reference is you, so, experiment, wherever you are, a whatever level of thought. You are the only reference, not the community; and when the community becomes the reference, you are lost. I hope there will be lots of people joining together and experimenting, having full confidence and therefore coming together; but for you to sit outside and say, `Why don't you form a community for me to join?', is obviously a foolish question.

J. Krishnamurti The Collected Works, Vol. V
Look at the truth

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