25 Jan 2010

ज्ञात से मुक्ति



सब तरह से मुक्त होना है, ज्ञात से मुक्ति, मन की वह अवस्था जो कहती है ‘‘मैं नहीं जानता’’ और जो उत्तर की राह भी नहीं तकती। ऐसा मन जो पूर्णतः किसी तलाश में नहीं होता ना ही ऐसी आशा करता है, ऐसे मन की अवस्था में आप कह सकते हैं कि ‘‘मैं समझा’’। केवल यही वह अवस्था होती है जब मन मुक्त होता है, इस अवस्था से आप उन चीजों को भी एक अलग ही तरह से देख सकते जिन्हें आप जानते हैं। ज्ञात से आप अज्ञात को नहीं देख सकते लेकिन जब कभी एक बार आप मन की उस अवस्था को समझ जाते हैं जो मुक्त है - जो मन कहता है कि ‘’’मैं नहीं जानता’’ और अजाना ही रहता है, इसलिए वह अबोध है.... उस अवस्था से एक नागरिक, एक विवाहित या आप जो भी हों वास्तविक कर्म करना शुरू करते हैं। तब आप जो भी करते हैं उसमें एक सुसंगतता होती है, जीवन में महत्व होता है।
लेकिन हम ज्ञात की सीमा में ही रहते हैं उसकी सभी विषमताओं के साथ, जीतोड़ प्रयासों, विवादों और पीड़ाओं के साथ और वहां से हम तलाश करते हैं उसकी, जो अज्ञात है, इसलिए वास्तव में हम मुक्ति नहीं चाह रहे हैं। हम जो चाहते हैं, वह है - जो है उसमें ही निरंतरता, वही पुरानी चीजों को और खींचना या लम्बाना... जो ज्ञात ही हैं।

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