27 Jan 2010

भ्रम को भ्रम सा देख लेने पर सब स्‍पष्‍ट हो जाता है



जीवन में प्रतिपल हो रहे परिवर्तनों के, निरन्तर स्पर्श में रहने को देखना* ध्यान है। एक व्यक्ति जो एक पापी से संत होने की विकासयात्रा में है वह एक संभ्रम से अन्य भ्रम में यात्रा कर रहा है। यह सारी गति भ्रम में ही है।  जब मन, यह भ्रम ही देख लेता है... तब वह पुनः भ्रम नहीं पैदा करता, ना ही किसी तरह की नापजोख या मापने को जारी रखता है। अंततः इसलिए बेहतर होते-होते, विचार का अंत आ जाता है। इन सबके साथ ही मुक्ति की अवस्था उदित होती है और यही पवित्र पावन है। केवल यहीं वह उपलब्ध होता है जो निरंतर है।


Meditation
Meditation is seeing the constant touching the ever-changing movement of life. The man who has progressed through being a sinner to being a saint has progressed from one illusion to another. This whole movement is an illusion. When the mind sees this illusion it is no longer creating any illusion, it is no longer measuring. Therefore thought has come to an end with regard to becoming better. Out of this comes a state of liberation - and this is sacred. This alone can, perhaps, receive the constant.
J. Krishnamurti, Krishnamurti Foundation Trust, Bulletin 22, 1974

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