28 Dec 2009

क्या मैं स्वयं ही जाग्रत हो सकता हूँ ?



वो चाहे खुशगवार हों या पीड़ाजनक, अपने आपको जागृत रखने के लिए हम अनुभवों पर निर्भर रहते हैं; किसी भी प्रकार की चुनौती हो हम अपने आपको जागा हुआ रखना चाहते हैं। जब कोई यह सच जान जाता है कि चुनौतियों और अनुभवों पर निर्भरता, दिमाग को केवल और ज्यादा कुंद या जड़ बनाती है और यह निर्भरता हमें जागे रहने नहीं रहने देती..... जब कोई यह समझ जाता है कि हमने हजारों युद्ध लड़ें हैं और एक बात भी नहीं सीखी कि हम अपने पड़ोसी को कल किसी क्षणिक सी उत्तेजना पर कत्ल कर सकते हैं... तब कोई कह सकता है कि जागे जागृत रहने के लिए यह अनुभव और चुनौतियों पर निर्भरता हम क्यों चाहते हैं? और क्या यह संभव है कि बिना किसी चुनौती के हम होशपूर्ण-जागृत-जागे रह सकें? यह ही मुख्य-असली प्रश्न है। हम चुनौतियों, अनुभवों पर यह सोच कर निर्भर रहते हैं कि ये हमें रोमांच, ज्यादा जिन्दापन, और ज्यादा त्वरितता देंगे, इनसे हमारा दिमाग और तेज होगा, पर इनसे ऐसा नहीं होता। तो यदि संभव हो तो मैं अपने आप से कहूं सम्पूर्ण रूप से जागृत-सचेत-होशपूर्ण के लिए.... आंशिक या टुकड़ों में नहीं या अपने अस्तित्व के कुछ बिन्दुओं पर ही नहीं... पर पूरी तरह जागृति, क्या बिना किसी चुनौती के, बिना किसी अनुभव के द्वारा। इसका मतलब ये भी है कि क्या मैं खुद ही प्रबुद्ध हो सकता हूँ, खुद को ही जगाये रह सकता हूँ बिना किसी बाहरी प्रकाश पर निर्भर हुए? इसका मतलब यह नहीं है कि यदि मैं किसी संवेदना उत्तेजना पर निर्भर नहीं रहकर, निरर्थक हो रहूंगा। क्या मैं कोई ऐसी रोशनी हो सकता हूँ जो बाह्य-उन्मुखी ना हो? यह सब जानने समझने के लिए हमें अपने में ही बहुत गहरे जाना होगा, मुझे खुद को ही पूरी तरह जानना होगा, सम्पूर्णतः.... अपने भीतर का एक-एक कोना मेरा जाना समझा होना चाहिये, कोई भी ऐसा कोना नहीं होना चाहिए जो दबा, ढंका, छिपा या रहस्यपूर्ण हो। सब कुछ खुला होना चाहिए। हमें अपने स्व, अपनत्व के, हमारेपन के सम्पूर्ण क्षेत्र के प्रति जागृत होना चाहिये, जो कि हमारी वैयक्तिता और हमारी सामाजिकता की चेतना है। यह जागरण केवल तब हो सकता है जब हमारा मन, वैयक्तिक और सामाजिक चेतना की परिधि के पार जाये तभी कोई संभावना है कि कोई अस्तित्व स्वतः प्रबुद्ध हो सके और बाह्य-उन्मुखी न हो।

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