28 Oct 2009

खूबसूरती का सार

क्या खूबसरती रंग है, आकार है, चेहरे की हड्डियां है, आँखों की स्पष्टता है, त्वचा या केश है, या खूबसूरत आदमी या औरत की अभिव्यक्ति में है? या खूबसूरती का कुछ और ही गुण है जो इस खूबसूरती का अतिक्रमण करता है, जो जिन्दगी में होने पर आकार, चेहरे और सब तरह की खूबसूरती अस्तित्व में आती है। अगर उस गुण को ही नहीं जाना-समझा जाता तभी, सभी बाहरी अभिव्यक्तियां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
आप जानते हैं आप जब कभी नीले आकाश की पृष्ठभूमि में किसी किसी शानदार पर्वत को देखते हैं, उसकी जीवन्त होना, चमक, धवलता, अप्रदूषित बर्फ, उसकी महिमा दिव्यपन आपको क्षुद्र विचारों, सरोकारों, समस्याओं को कहीं और ही ढकेल देता है। क्या आपने कभी गौर किया है? आप कहते हैं ”ये कितना सुन्दर है,” दो कुछ क्षणों के लिए, आप एकदम शांत निस्तब्ध हो जाते हैं। उस पर्वत की भव्यता कुछ क्षणों के लिए आपकी क्षुद्रताओं को आपसे अलग थलग कर देती है। वैसे ही जैसे एक बच्चा किसी जटिल खिलौने में घंटों के लिए डूब जाता है। वह खिलौना उसे पूरी तरह अवशोषित कर लेता है, अपने में समो लेता है। इसी तरह पर्वत क्षण भर में लिए आपको अपनी भव्यता में समो लेता है, आप पूर्णतः शांत स्तब्ध हो जाते हैं, जिसका मतलब है आप अपने आपको पूरी तरह भूल जाते हैं। आपका अहं कुछ क्षणों के लिए खो जाता है।
अब, किसी के द्वारा अपने में समो लिये जाने के बगैर.... चाहे वह कोई खिलौना हो, कोई भव्य पर्वत हो या चेहरा हो या कोई विचार, क्या आप स्वयं ही उस अहंशून्यता में नहीं रह सकते। यही सच्ची खूबसूरती है, खूबसूरती का सार है।
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