27 Oct 2009

आलोचना के बिना, जागरूक भर रहना

ध्यान ऐसी चीज नहीं है कि उसे करने के बारे में सोचा जाये या नियत समय सारणी बनायी जाये या मुहूर्त निकाला जाये। यह तंत्र-मंत्र-यंत्र जैसा नहीं कि जप-तप के लिए फलां-फलां जगह हो, कम्बल या किसी विशेष तरह का आसन हो, दिशा विशेष की ओर मुंह हो, ध्यान के सबंध में ये सारी बातें फालतू हैं। यह ऐसा ही है कि तुरंत अभी शुरू करना चाहिए। आसपास के वृक्षों को देखें, आसमान देखें, गिलहरी, चिड़िया, मछली को देखें, पत्ते पर पड़ते प्रकाश को देखें, किसी के परिधान के रंगों को, किसी का चेहरा,,, इसके बाद ही बात गहराई की ओर चलती है। धीरे-धीरे हम अन्दर की ओर खिसकते हैं। हम बाहरी चीजों को देखते हुए बिना पसंद-नापसंद के जागरूक हो सकते हैं, यह बहुत ही सरल है। लेकिन जब हम अन्दर, अपने भीतर की ओर जाते हैं तो बिना किसी आलोचना, बिना किसी निर्णय, बिना तुलना किये रहना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। लेकिन हमें बस यह करना है कि हम अपने विश्वासों, डरों, झूठी मान्यताओं, भ्रमों , आशाओं, अवसादों, आकांक्षाओं और इसी तरह की अन्य सारी बातों के प्रति जागरूक रहें। इसी तरह हम परत-दर-परत अपने मन की ऊपरी सतहों और फिर गहरे तलों की यात्रा की शुरूआत कर सकते हैं।
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